नई दिल्ली। समाजसेवी जितेन्द्र कुशवाहा ने मृत्यु भोज जैसी सामाजिक परंपराओं पर विचार करते हुए कहा कि किसी परिवार में मृत्यु होने पर पहले से ही परिजन गहरे दुख और मानसिक पीड़ा से गुजर रहे होते हैं। ऐसे समय में मृत्यु भोज के नाम पर होने वाला अनावश्यक खर्च परिवार पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल सकता है। इसलिए समाज में जागरूकता फैलाने और इस विषय पर सकारात्मक संवाद करने की आवश्यकता है।
जितेन्द्र कुशवाहा ने कहा कि किसी प्रियजन के निधन के बाद परिवार को आर्थिक दबाव में डालना उचित नहीं है। शोक की इस घड़ी में समाज और रिश्तेदारों की जिम्मेदारी परिवार को सहयोग, संवेदना और संबल देने की होनी चाहिए, न कि उस पर खर्च का दबाव बनाने की।
जितेन्द्र कुशवाहा ने लोगों से अपील की कि मृत्यु भोज के विषय पर आपसी सहमति, संवेदनशीलता और सामाजिक जागरूकता के साथ आगे आएं। परिवार की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए अनावश्यक खर्च से बचें और जरूरत पड़ने पर शोकाकुल परिवार की आर्थिक मदद करें।
उन्होंने कहा कि समाज की असली जिम्मेदारी दिखावे को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि दुख की घड़ी में एक-दूसरे का सहारा बनना है। जागरूकता, शिक्षा और आपसी सहयोग के माध्यम से ही ऐसी सामाजिक सोच विकसित की जा सकती है, जिसमें परिवारों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ न पड़े।
रिपोर्ट: जितेन्द्र कुशवाहा
सामाजिक जागरूकता टाइम्स
कलम की शक्ति से समाज में जागरूकता
