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शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

उपेन्द्र कुशवाहा को ‘प्रबुद्ध राष्ट्रवाद’ बुकलेट भेंट, सामाजिक मुद्दों पर चर्चा

उपेन्द्र कुशवाहा को एडवोकेट हेमंत कुमार मौर्य द्वारा ‘प्रबुद्ध राष्ट्रवाद – भारत की असली पहचान’ बुकलेट भेंट करते हुए
एनडीए के कद्दावर नेता एवं राज्यसभा सांसद उपेन्द्र कुशवाहा को भेंट की गई 'प्रबुद्ध राष्ट्रवाद – भारत की असली पहचान' बुकलेट

नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता एडवोकेट हेमंत कुमार मौर्य ने राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष, एनडीए के वरिष्ठ नेता एवं राज्यसभा सांसद Upendra Kushwaha से शिष्टाचार भेंट की। इस अवसर पर उन्होंने अपनी वैचारिक पुस्तिका "प्रबुद्ध राष्ट्रवाद – भारत की असली पहचान" उन्हें भेंट की।

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मुलाकात के दौरान देश, समाज और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़े विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर सार्थक चर्चा हुई। विशेष रूप से शिक्षा, सामाजिक समरसता, युवाओं की भागीदारी, राष्ट्र निर्माण में नागरिकों की भूमिका तथा समाज के वंचित एवं पिछड़े वर्गों के उत्थान जैसे मुद्दों पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया। अधिवक्ता हेमंत कुमार मौर्य ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक विरासत, संविधान के आदर्शों और राष्ट्रहित को केंद्र में रखकर समाज को जागरूक करने की आवश्यकता है। इसी उद्देश्य से उन्होंने "प्रबुद्ध राष्ट्रवाद – भारत की असली पहचान" बुकलेट तैयार की है, जो राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध, सामाजिक उत्तरदायित्व और सकारात्मक सोच का संदेश देती है।

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राज्यसभा सांसद उपेन्द्र कुशवाहा ने बुकलेट प्राप्त कर प्रसन्नता व्यक्त की तथा इस प्रकार के वैचारिक और रचनात्मक प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि समाज में जागरूकता, शिक्षा और सकारात्मक संवाद को बढ़ावा देने वाले प्रयास लोकतंत्र को और अधिक सशक्त बनाते हैं। उन्होंने युवाओं को राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाने और सामाजिक एकता को मजबूत करने का भी संदेश दिया।

मुलाकात सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न हुई। उपस्थित लोगों ने आशा व्यक्त की कि इस प्रकार के वैचारिक संवाद समाज में सकारात्मक परिवर्तन, राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक समरसता को नई दिशा प्रदान करेंगे।

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🖋️ रिपोर्ट: अनीत मौर्य
📝 संपादक: जितेंद्र कुशवाहा (सामाजिक जागरूकता टाइम्स)

भिखारी ठाकुर की 55वीं पुण्यतिथि: आज के युवाओं के लिए प्रेरणा | जितेंद्र कुशवाहा

लेखक: समाजसेवी जितेंद्र कुशवाहा प्रकाशन: सामाजिक जागरूकता टाइम्स

"जिस समाज का युवा अपनी संस्कृति, भाषा और लोकनायकों को भूल जाता है, वह समाज अपनी पहचान भी धीरे-धीरे खो देता है।"

10 जुलाई 1971 को भोजपुरी साहित्य, लोकनाट्य और जनजागरण के महानायक भिखारी ठाकुर इस संसार से विदा हुए। उनकी विरासत आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में जीवित है। उनकी 55वीं पुण्यतिथि केवल एक महान लोक कलाकार को श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन करने का भी समय है कि आज का युवा उनके विचारों से क्या सीख सकता है।

भिखारी ठाकुर को केवल "भोजपुरी के शेक्सपियर" कहना पर्याप्त नहीं होगा। वे एक लेखक, लोकनाटककार, गीतकार, अभिनेता, निर्देशक और सबसे बढ़कर समाज सुधारक थे। उन्होंने उस दौर में समाज की उन समस्याओं को मंच पर उतारा, जिन पर खुलकर बात करना भी आसान नहीं था। बाल विवाह, दहेज प्रथा, बेटियों की खरीद-फरोख्त, पलायन, जातिगत भेदभाव, महिलाओं की पीड़ा और सामाजिक असमानता जैसे विषयों को उन्होंने लोकभाषा के माध्यम से आम लोगों तक पहुँचाया।

आज जब हम 21वीं सदी में खड़े हैं, तो यह प्रश्न उठता है कि क्या भिखारी ठाकुर के विचार आज भी प्रासंगिक हैं? मेरा उत्तर है—पहले से भी अधिक।

बदलता समय, वही चुनौतियाँ

आज तकनीक ने दुनिया को बदल दिया है। मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने युवाओं को वैश्विक मंच दे दिया है। लेकिन दूसरी ओर, समाज नई चुनौतियों से भी जूझ रहा है। बेरोज़गारी, नशे की बढ़ती प्रवृत्ति, सोशल मीडिया की लत, मानसिक तनाव, पारिवारिक दूरी, सांस्कृतिक विघटन और भाषा से बढ़ती दूरी युवाओं के सामने गंभीर प्रश्न बनकर खड़े हैं।

भिखारी ठाकुर का साहित्य हमें बताता है कि समाज की सबसे बड़ी ताकत उसकी संवेदनशीलता और सांस्कृतिक चेतना होती है। यदि युवा अपनी जड़ों से जुड़े रहेंगे, तो आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बना सकेंगे।

"बिदेसिया" आज भी क्यों प्रासंगिक है?

भिखारी ठाकुर का प्रसिद्ध नाटक "बिदेसिया" उस दौर के पलायन की कहानी था। आज भी लाखों युवा रोजगार, शिक्षा और बेहतर जीवन की तलाश में अपने गाँव और परिवार से दूर महानगरों या विदेशों में जाते हैं।

समय बदला है, लेकिन भावनाएँ नहीं बदलीं। आज भी माता-पिता अपने बच्चों के लौटने का इंतज़ार करते हैं। आज भी गाँव प्रतिभाओं के पलायन से खाली होते जा रहे हैं। इसलिए "बिदेसिया" केवल एक नाटक नहीं, बल्कि भारतीय समाज की एक सतत सच्चाई है।

आज के युवाओं को यह समझना होगा कि सफलता केवल बड़े शहरों में नहीं, बल्कि अपने समाज और अपने क्षेत्र के विकास में योगदान देने में भी है।

बेटियों के सम्मान का संदेश

भिखारी ठाकुर का "बेटी बेचवा" केवल एक नाटक नहीं था, बल्कि समाज के सामने एक आईना था। उन्होंने उस समय बेटियों के अधिकारों की बात की, जब महिलाओं की आवाज़ को अक्सर दबा दिया जाता था।

आज परिस्थितियाँ बदली हैं। बेटियाँ शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन, खेल और राजनीति हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। फिर भी दहेज, भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा और लैंगिक भेदभाव जैसी समस्याएँ पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं।

आज के युवा यदि वास्तव में भिखारी ठाकुर को श्रद्धांजलि देना चाहते हैं, तो उन्हें महिलाओं के सम्मान, समान अवसर और सुरक्षित समाज के निर्माण का संकल्प लेना होगा।

अपनी भाषा पर गर्व करें

भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी को केवल बोली नहीं माना, बल्कि जनभावनाओं की भाषा बनाया। उन्होंने सिद्ध किया कि मातृभाषा में समाज की आत्मा बसती है।

आज का युवा अंग्रेज़ी और आधुनिक शिक्षा अवश्य प्राप्त करे, लेकिन अपनी मातृभाषा—चाहे वह भोजपुरी, मगही, मैथिली, अवधी, ब्रज, हरियाणवी या कोई अन्य भारतीय भाषा हो—पर गर्व करना भी उतना ही आवश्यक है।

जो युवा अपनी भाषा और संस्कृति का सम्मान करता है, वही दुनिया के सामने अपनी अलग पहचान बना सकता है।

सोशल मीडिया का सकारात्मक उपयोग

यदि आज भिखारी ठाकुर जीवित होते, तो संभवतः वे भी सोशल मीडिया का उपयोग समाज सुधार के लिए करते। वे छोटे-छोटे वीडियो, लोकगीत, नाटक और संवादों के माध्यम से करोड़ों लोगों तक अपना संदेश पहुँचाते।

आज के युवाओं के हाथ में मोबाइल है। प्रश्न यह नहीं कि मोबाइल अच्छा है या बुरा। प्रश्न यह है कि उसका उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है।

यदि सोशल मीडिया पर नफ़रत के बजाय जागरूकता, अश्लीलता के बजाय संस्कृति, अफवाहों के बजाय सत्य और नकारात्मकता के बजाय प्रेरणा साझा की जाए, तो वही भिखारी ठाकुर के विचारों का वास्तविक विस्तार होगा।

समाज सेवा ही सच्ची श्रद्धांजलि

भिखारी ठाकुर ने समाज की पीड़ा को महसूस किया। उन्होंने केवल समस्याएँ नहीं गिनाईं, बल्कि लोगों को सोचने और बदलने की प्रेरणा दी।

आज का युवा यदि किसी गरीब बच्चे की शिक्षा में सहयोग करता है, किसी जरूरतमंद परिवार की सहायता करता है, रक्तदान करता है, पर्यावरण संरक्षण में भाग लेता है, नशा मुक्ति अभियान चलाता है या सामाजिक एकता के लिए कार्य करता है, तो यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

संस्कृति और आधुनिकता का संतुलन

आधुनिक बनना आवश्यक है, लेकिन अपनी संस्कृति को छोड़ देना बुद्धिमानी नहीं है। भिखारी ठाकुर हमें सिखाते हैं कि आधुनिक विचारों को अपनाते हुए भी अपनी लोक परंपरा, लोककला और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखा जा सकता है।

आज का युवा यदि लोकगीत, लोकनृत्य, लोकनाटक और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को आगे बढ़ाएगा, तो आने वाली पीढ़ियाँ भी अपनी पहचान पर गर्व करेंगी।

युवाओं के लिए पाँच संदेश

भिखारी ठाकुर के जीवन से आज का युवा पाँच महत्वपूर्ण बातें सीख सकता है—

  1. संघर्ष से कभी मत डरिए।

  2. अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व कीजिए।

  3. समाज की समस्याओं के प्रति संवेदनशील बनिए।

  4. महिलाओं का सम्मान और समानता सुनिश्चित कीजिए।

  5. अपनी प्रतिभा का उपयोग केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि समाज के विकास के लिए भी कीजिए।

आज की सबसे बड़ी आवश्यकता

आज देश को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो केवल नौकरी खोजने वाले नहीं, बल्कि समाज बदलने वाले हों; जो केवल सोशल मीडिया पर सक्रिय न हों, बल्कि समाज के बीच भी सक्रिय हों; जो केवल सफलता की बात न करें, बल्कि जिम्मेदारी भी निभाएँ।

भिखारी ठाकुर का जीवन हमें यही प्रेरणा देता है कि सीमित संसाधनों के बावजूद यदि इरादे मजबूत हों, तो एक साधारण व्यक्ति भी इतिहास रच सकता है।


        निष्कर्ष भिखारी ठाकुर की 55वीं पुण्यतिथि पर हम उन्हें केवल पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि न दें, बल्कि उनके विचारों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें। यदि आज का युवा उनकी संवेदनशीलता, सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक गौरव और जनसेवा की भावना को अपनाता है, तो यही उनके प्रति सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।

मैं सभी युवाओं से आग्रह करता हूँ कि अपने मोबाइल की स्क्रीन से बाहर निकलकर समाज की वास्तविक समस्याओं को भी देखें। शिक्षा प्राप्त करें, आत्मनिर्भर बनें, अपने माता-पिता का सम्मान करें, अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ें तथा समाज में सकारात्मक परिवर्तन के वाहक बनें।

भिखारी ठाकुर ने कलम और मंच को समाज परिवर्तन का माध्यम बनाया था। आज हमारे पास तकनीक, शिक्षा और अवसर हैं। यदि हम इन साधनों का उपयोग जनजागरण, सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण के लिए करें, तो यही उनके सपनों के भारत की दिशा में हमारा योगदान होगा।

आइए, भिखारी ठाकुर की 55वीं पुण्यतिथि पर हम यह संकल्प लें कि उनकी लोकचेतना, सामाजिक न्याय और मानवीय मूल्यों की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाएँगे। यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

आलू मोड़ पर MCD की लापरवाही, कूड़े में प्लास्टिक खा रही हैं गौ माता

भाटी माइंस के आलू मोड़ पर MCD की लापरवाही के कारण कूड़े के ढेर में प्लास्टिक खाती गौ माता।नई दिल्ली। दक्षिणी दिल्ली के भाटी माइंस स्थित आलू मोड़ क्षेत्र में नगर निगम (MCD) की सफाई व्यवस्था पर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि सफाई कर्मचारियों की लापरवाही के कारण डस्टबिन के आसपास कूड़े का ढेर लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे पूरे क्षेत्र में गंदगी और दुर्गंध का माहौल बना हुआ है।

क्षेत्रवासियों के अनुसार, सफाई कर्मचारी प्रतिदिन केवल डस्टबिन के अंदर मौजूद कचरे को उठाकर चले जाते हैं, जबकि डस्टबिन के बाहर फैला प्लास्टिक, कागज़, पॉलीथिन, खाद्य सामग्री का कचरा और अन्य गंदगी वहीं पड़ी रहती है। धीरे-धीरे यह कूड़ा एक बड़े ढेर का रूप ले लेता है, जिससे आसपास रहने वाले लोगों और राहगीरों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि कूड़े के ढेर से उठने वाली दुर्गंध के कारण आसपास का वातावरण प्रदूषित हो रहा है। बरसात के मौसम में यह समस्या और गंभीर हो जाती है, क्योंकि कचरे से मच्छर और मक्खियाँ पनपने लगती हैं, जिससे संक्रामक बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को इस गंदगी के बीच से होकर गुजरना पड़ता है, जिससे स्वच्छता अभियान के दावों पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
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बाल लेखक अविक अरोड़ा की पुस्तक का विमोचन, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान से मिला आशीर्वाद

सबसे चिंताजनक बात यह है कि कूड़े के ढेर में गौ माता और अन्य आवारा पशु भोजन की तलाश में प्लास्टिक, पॉलीथिन और अन्य हानिकारक अपशिष्ट खा रहे हैं। पशु चिकित्सकों के अनुसार प्लास्टिक का सेवन पशुओं के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक होता है। इससे उनके पाचन तंत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है, कई बार जानलेवा स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते कूड़े का उचित प्रबंधन नहीं किया गया, तो यह न केवल पशुओं बल्कि पर्यावरण और जनस्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा बन सकता है।

निवासियों का कहना है कि यदि सफाई कर्मचारी डस्टबिन के साथ-साथ उसके आसपास फैले कचरे की भी नियमित सफाई करें, तो क्षेत्र को साफ-सुथरा और स्वच्छ रखा जा सकता है। उनका मानना है कि केवल डस्टबिन खाली कर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि आसपास की सफाई भी उतनी ही आवश्यक है।

स्थानीय नागरिकों ने नगर निगम के वरिष्ठ अधिकारियों से मांग की है कि आलू मोड़ क्षेत्र की सफाई व्यवस्था की नियमित निगरानी की जाए तथा संबंधित कर्मचारियों को आवश्यक निर्देश दिए जाएँ। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि डस्टबिन के आसपास फैले कचरे को भी प्रतिदिन हटाया जाए तथा खुले में प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट न पड़े रहें। इससे क्षेत्रवासियों को स्वच्छ वातावरण मिलेगा और गौ माता सहित अन्य पशुओं का जीवन भी सुरक्षित रह सकेगा।📖 यह भी पढ़ें :जनपथ मार्केट का इतिहास: दिल्ली के सबसे लोकप्रिय बाजार की पूरी कहानी

क्षेत्रवासियों ने उम्मीद जताई है कि नगर निगम इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए शीघ्र प्रभावी कार्रवाई करेगा, ताकि भाटी माइंस के आलू मोड़ क्षेत्र को गंदगी, दुर्गंध और खुले कचरे से मुक्ति मिल सके।

🖊️ रिपोर्ट: अमित कुमार झा, संवाददाता
भाटी माइंस, नई दिल्ली

गुरुवार, 30 जुलाई 2026

बाल लेखक अविक अरोड़ा की पुस्तक का विमोचन, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान से मिला आशीर्वाद

                       

विशेष संवाददाता: अनूप मौर्य नई दिल्ली, 30 जुलाई 2026होनहार छात्र एवं युवा बाल लेखक अविक अरोड़ा ने कम आयु में साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल करते हुए अपनी पुस्तक "Punch: End of Alone" का सफलतापूर्वक प्रकाशन किया है। यह उपलब्धि न केवल उनके परिवार, बल्कि पूरे समाज के लिए गर्व और प्रेरणा का विषय बन गई है।

पुस्तक के प्रकाशन के उपलक्ष्य में अविक अरोड़ा ने भारत सरकार के माननीय श्री चिराग पासवान, केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री, से शिष्टाचार भेंट की। इस अवसर पर माननीय मंत्री ने पुस्तक का अवलोकन किया, अविक के साहित्यिक प्रयासों की सराहना करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएँ एवं अपना स्नेहिल आशीर्वाद प्रदान किया। उन्होंने कहा कि देश के बच्चों की प्रतिभा को उचित मार्गदर्शन और अवसर मिलें तो वे राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान बना सकते हैं।

इस अवसर पर समाजसेवी जितेंद्र कुशवाहा ने अविक अरोड़ा को उनकी इस उल्लेखनीय उपलब्धि पर हार्दिक बधाई देते हुए उनके माता-पिता के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, "अविक की यह सफलता केवल उनके परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की सफलता है। ऐसे प्रतिभाशाली बच्चों की उपलब्धियाँ समाज के लिए प्रेरणादायक होती हैं। इससे अन्य बच्चों को भी आगे बढ़ने, बड़े सपने देखने और उन्हें साकार करने की शक्ति एवं आत्मविश्वास मिलेगा। किसी भी बच्चे की सफलता के पीछे उसके माता-पिता के संस्कार, प्रोत्साहन और समर्पण की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मैं अविक और उनके परिवार को उज्ज्वल भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।"

अविक अरोड़ा की इस उपलब्धि पर डॉ. विभु आनंद, संजय भाई, अमित कुमार, सुभोध कुमार, अशोक पंडित, संतोष कुमार पंडित, मिंटू कुमार तथा रमेश कुमार ने भी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उन्हें एवं उनके परिवार को बधाई दी। सभी ने कहा कि कम आयु में साहित्य सृजन करना अत्यंत सराहनीय उपलब्धि है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि अविक भविष्य में भी अपने लेखन से समाज को सकारात्मक दिशा देंगे तथा देश के लाखों विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा बनेंगे।

अविक अरोड़ा की यह सफलता इस बात का प्रमाण है कि दृढ़ संकल्प, निरंतर परिश्रम, पारिवारिक सहयोग, मार्गदर्शन और सकारात्मक सोच के बल पर कम आयु में भी असाधारण उपलब्धियाँ हासिल की जा सकती हैं। यह उपलब्धि देशभर के विद्यार्थियों, युवा लेखकों और अभिभावकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी।

बुधवार, 29 जुलाई 2026

जनपथ मार्केट का इतिहास: दिल्ली के सबसे लोकप्रिय बाजार की पूरी कहानी

जनपथ मार्केट: इतिहास, विरासत और आधुनिक दिल्ली की पहच

लेखक: जितेंद्र कुशवाहानई दिल्ली की पहचान केवल संसद भवन, इंडिया गेट और कर्तव्य पथ तक सीमित नहीं है। राजधानी की सांस्कृतिक और व्यावसायिक धड़कन को समझना हो तो जनपथ मार्केट का रुख करना चाहिए। कनॉट प्लेस के निकट स्थित यह बाजार वर्षों से देश-विदेश के पर्यटकों, युवाओं, कलाकारों और खरीदारी के शौकीनों का पसंदीदा केंद्र बना हुआ है। जनपथ केवल एक बाजार नहीं, बल्कि भारत की विविध संस्कृति, हस्तशिल्प और उद्यमिता का जीवंत प्रतीक है।

ब्रिटिश शासन के दौरान आज के जनपथ मार्ग को "क्वीन्स वे" के नाम से जाना जाता था। वर्ष 1947 में देश की स्वतंत्रता के बाद औपनिवेशिक नामों को भारतीय पहचान देने की प्रक्रिया में इसका नाम बदलकर "जनपथ" रखा गया, जिसका अर्थ है "जनता का मार्ग"। नई दिल्ली के विकास के साथ इस क्षेत्र ने भी तेजी से व्यावसायिक रूप धारण किया और देखते ही देखते यह राजधानी के प्रमुख बाजारों में शामिल हो गया।

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जनपथ मार्केट की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सांस्कृतिक विविधता है। यहां कश्मीर के पश्मीना शॉल, राजस्थान की हस्तनिर्मित कलाकृतियां, गुजरात की कढ़ाई, पूर्वोत्तर भारत के पारंपरिक उत्पाद, तिब्बती हस्तशिल्प और भारतीय कारीगरों द्वारा निर्मित अनेक आकर्षक वस्तुएं एक ही स्थान पर उपलब्ध हैं। यही कारण है कि विदेशी पर्यटक भारतीय संस्कृति की झलक अपने साथ स्मृति-चिह्न के रूप में यहां से लेकर जाते हैं।

यह बाजार विशेष रूप से युवाओं के बीच फैशन हब के रूप में लोकप्रिय है। आधुनिक डिजाइन की कुर्तियां, ऑक्सीडाइज्ड ज्वेलरी, हैंडबैग, स्कार्फ, फैशन एक्सेसरीज और घरेलू सजावटी वस्तुएं यहां किफायती दामों पर उपलब्ध होती हैं। यहां खरीदारी का सबसे रोचक अनुभव मोलभाव की परंपरा है, जो भारतीय बाजार संस्कृति की विशेष पहचान मानी जाती है।

आज डिजिटल युग में भी जनपथ मार्केट अपनी लोकप्रियता बनाए हुए है। ऑनलाइन शॉपिंग के बढ़ते प्रभाव के बावजूद लोग यहां खरीदारी के साथ-साथ दिल्ली की जीवंत संस्कृति का अनुभव लेने आते हैं। दिल्ली मेट्रो की बेहतर कनेक्टिविटी ने इस बाजार तक पहुंचना और भी आसान बना दिया है। जनपथ और राजीव चौक मेट्रो स्टेशन से यह बाजार पैदल दूरी पर स्थित है।

नई दिल्ली नगर परिषद (NDMC) द्वारा समय-समय पर बाजार के सौंदर्यीकरण, स्वच्छता, प्रकाश व्यवस्था और सार्वजनिक सुविधाओं में सुधार के प्रयास किए गए हैं। इससे बाजार अधिक व्यवस्थित, सुरक्षित और पर्यटकों के अनुकूल बना है। हालांकि पार्किंग की समस्या, बढ़ती भीड़ और ऑनलाइन बाजार की प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियां आज भी मौजूद हैं।

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जनपथ मार्केट हजारों छोटे व्यापारियों, कारीगरों और हस्तशिल्प कलाकारों की आजीविका का महत्वपूर्ण स्रोत भी है। यहां का प्रत्येक स्टॉल भारत की किसी न किसी कला, परंपरा और स्थानीय उद्यम की कहानी कहता है। ऐसे बाजार न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देते हैं, बल्कि "वोकल फॉर लोकल" और "मेक इन इंडिया" जैसे अभियानों को भी वास्तविक आधार प्रदान करते हैं।

भविष्य में यदि जनपथ मार्केट में विरासत संरक्षण, डिजिटल सूचना प्रणाली, स्मार्ट पार्किंग, पर्यटक सहायता केंद्र और स्थानीय हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाएं लागू की जाती हैं, तो यह विश्व के प्रमुख स्ट्रीट मार्केट्स में और अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकता है।

जनपथ मार्केट दिल्ली की उस जीवंत पहचान का नाम है, जहां इतिहास और आधुनिकता साथ-साथ चलते हैं। यहां खरीदारी केवल वस्तुएं खरीदना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, कला और परंपरा को करीब से महसूस करने का अवसर है। यही कारण है कि जनपथ आज भी राजधानी की शान और भारत की सांस्कृतिक विविधता का एक सशक्त प्रतीक बना हुआ है।

उपेन्द्र कुशवाहा को ‘प्रबुद्ध राष्ट्रवाद’ बुकलेट भेंट, सामाजिक मुद्दों पर चर्चा

उपेन्द्र कुशवाहा को एडवोकेट हेमंत कुमार मौर्य द्वारा ‘प्रबुद्ध राष्ट्रवाद – भारत की असली पहचान’ बुकलेट भेंट करते हुए एनडीए के कद्दावर नेता ए...

प्रिय पाठकों, आपका स्वागत है।

🙏 पढ़ने के लिए धन्यवाद। सामाजिक जागरूकता टाइम्स के साथ जुड़े रहें।🙏