बुधवार, 16 सितंबर 2026

मोबाइल पर होमवर्क देने की बढ़ती प्रवृत्ति बच्चों के स्वास्थ्य और दिनचर्या पर डाल रही प्रतिकूल प्रभाव: जितेंद्र कुशवाहा

नई दिल्ली। डिजिटल शिक्षा के बढ़ते दौर में विद्यालयों द्वारा विद्यार्थियों को मोबाइल फोन के माध्यम से गृहकार्य, नोट्स, प्रोजेक्ट और अन्य शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है। जहां एक ओर इसे आधुनिक शिक्षा प्रणाली का हिस्सा माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके दुष्प्रभाव भी सामने आने लगे हैं। अभिभावकों और शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि मोबाइल आधारित होमवर्क बच्चों की दिनचर्या, स्वास्थ्य और मानसिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है।

कई अभिभावकों का कहना है कि बच्चों को जब गृहकार्य मोबाइल पर दिया जाता है तो वे पढ़ाई के साथ-साथ सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेम, वीडियो प्लेटफॉर्म और अन्य मनोरंजन सामग्री की ओर भी आकर्षित हो जाते हैं। इससे उनका स्क्रीन टाइम लगातार बढ़ रहा है और वे लंबे समय तक मोबाइल के संपर्क में बने रहते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए नियमित दिनचर्या, पर्याप्त नींद, खेलकूद, शारीरिक गतिविधियां और सामाजिक सहभागिता अत्यंत आवश्यक हैं। लेकिन मोबाइल के अत्यधिक उपयोग के कारण बच्चों में आंखों की समस्या, सिरदर्द, एकाग्रता में कमी, मानसिक तनाव तथा शारीरिक निष्क्रियता जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। इसके अलावा बच्चों का पारिवारिक और सामाजिक संवाद भी प्रभावित हो रहा है।

इस विषय पर सामाजिक चिंतक एवं सामाजिक जागरूकता टाइम्स के संपादक जितेंद्र कुशवाहा ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि विद्यालयों द्वारा मोबाइल आधारित होमवर्क देने की बढ़ती प्रवृत्ति आने वाले समय में बच्चों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। उन्होंने कहा कि पढ़ाई के नाम पर बच्चों का घंटों मोबाइल स्क्रीन के सामने रहना उनकी आंखों, मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

जितेंद्र कुशवाहा ने कहा कि यदि समय रहते इस विषय पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो भविष्य में बच्चों में मोबाइल निर्भरता, नींद संबंधी समस्याएं, मोटापा, तनाव और एकाग्रता की कमी जैसी समस्याएं और अधिक बढ़ सकती हैं। उन्होंने विद्यालय प्रबंधन, शिक्षा विभाग तथा अभिभावकों से बच्चों के हित में संतुलित व्यवस्था अपनाने का आग्रह किया।

उन्होंने सुझाव दिया कि जहां तक संभव हो, विद्यालयों को लिखित गृहकार्य, पुस्तकों और प्रत्यक्ष शिक्षण पद्धति को प्राथमिकता देनी चाहिए। साथ ही अभिभावकों को भी बच्चों के मोबाइल उपयोग की निगरानी करनी चाहिए और उन्हें सीमित समय के लिए ही मोबाइल उपलब्ध कराना चाहिए।

उन्होंने कहा कि तकनीक शिक्षा का एक महत्वपूर्ण साधन है, लेकिन इसका विवेकपूर्ण और संतुलित उपयोग ही बच्चों के उज्ज्वल भविष्य तथा स्वस्थ जीवन की आधारशिला बन सकता है। बच्चों के सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखते हुए शिक्षा व्यवस्था में ऐसी नीतियों की आवश्यकता है, जिनसे तकनीक का लाभ भी मिले और बच्चों का स्वास्थ्य तथा बचपन भी सुरक्षित रह सके।

रिपोर्ट: जितेंद्र कुशवाहा
संपादक, सामाजिक जागरूकता टाइम्स (SJ Times)

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