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शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

उपेन्द्र कुशवाहा को ‘प्रबुद्ध राष्ट्रवाद’ बुकलेट भेंट, सामाजिक मुद्दों पर चर्चा

उपेन्द्र कुशवाहा को एडवोकेट हेमंत कुमार मौर्य द्वारा ‘प्रबुद्ध राष्ट्रवाद – भारत की असली पहचान’ बुकलेट भेंट करते हुए
एनडीए के कद्दावर नेता एवं राज्यसभा सांसद उपेन्द्र कुशवाहा को भेंट की गई 'प्रबुद्ध राष्ट्रवाद – भारत की असली पहचान' बुकलेट

नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता एडवोकेट हेमंत कुमार मौर्य ने राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष, एनडीए के वरिष्ठ नेता एवं राज्यसभा सांसद Upendra Kushwaha से शिष्टाचार भेंट की। इस अवसर पर उन्होंने अपनी वैचारिक पुस्तिका "प्रबुद्ध राष्ट्रवाद – भारत की असली पहचान" उन्हें भेंट की।

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मुलाकात के दौरान देश, समाज और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़े विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर सार्थक चर्चा हुई। विशेष रूप से शिक्षा, सामाजिक समरसता, युवाओं की भागीदारी, राष्ट्र निर्माण में नागरिकों की भूमिका तथा समाज के वंचित एवं पिछड़े वर्गों के उत्थान जैसे मुद्दों पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया। अधिवक्ता हेमंत कुमार मौर्य ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक विरासत, संविधान के आदर्शों और राष्ट्रहित को केंद्र में रखकर समाज को जागरूक करने की आवश्यकता है। इसी उद्देश्य से उन्होंने "प्रबुद्ध राष्ट्रवाद – भारत की असली पहचान" बुकलेट तैयार की है, जो राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध, सामाजिक उत्तरदायित्व और सकारात्मक सोच का संदेश देती है।

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राज्यसभा सांसद उपेन्द्र कुशवाहा ने बुकलेट प्राप्त कर प्रसन्नता व्यक्त की तथा इस प्रकार के वैचारिक और रचनात्मक प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि समाज में जागरूकता, शिक्षा और सकारात्मक संवाद को बढ़ावा देने वाले प्रयास लोकतंत्र को और अधिक सशक्त बनाते हैं। उन्होंने युवाओं को राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाने और सामाजिक एकता को मजबूत करने का भी संदेश दिया।

मुलाकात सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न हुई। उपस्थित लोगों ने आशा व्यक्त की कि इस प्रकार के वैचारिक संवाद समाज में सकारात्मक परिवर्तन, राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक समरसता को नई दिशा प्रदान करेंगे।

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🖋️ रिपोर्ट: अनीत मौर्य
📝 संपादक: जितेंद्र कुशवाहा (सामाजिक जागरूकता टाइम्स)

सोमवार, 22 जून 2026

पुत्र मोह के कारण बढ़ रहे तलाक, पारिवारिक कलह और बिखरता परिवार

 

पुत्र मोह और बेटियों के प्रति भेदभाव : आखिर बेटियों का कसूर क्या है?

भारत आज स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने का अमृत महोत्सव मना चुका है और विश्वगुरु बनने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है। शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक विकास के क्षेत्र में देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है। इसके बावजूद समाज के एक बड़े वर्ग में आज भी पुत्र मोह की मानसिकता गहराई से मौजूद है, जो अनेक पारिवारिक समस्याओं, कलह और यहां तक कि तलाक का कारण बन रही है।

आज भी कई परिवारों में यह धारणा बनी हुई है कि वंश को आगे बढ़ाने के लिए घर में पुत्र का होना आवश्यक है। बेटी के जन्म को खुशी के बजाय निराशा की दृष्टि से देखा जाता है। परिणामस्वरूप कई दंपति पुत्र प्राप्ति की चाह में लगातार संतान उत्पन्न करते रहते हैं। यदि परिवार में केवल बेटियां हों और पुत्र न हो, तो कई लोग परिवार को अधूरा मानते हैं। यह सोच न केवल बेटियों के सम्मान को ठेस पहुंचाती है बल्कि महिलाओं के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव डालती है।

सबसे दुखद स्थिति तब उत्पन्न होती है जब पुत्र न होने का दोष महिला पर मढ़ दिया जाता है। वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध हो चुका है कि संतान का लिंग निर्धारित होने में महिला की कोई भूमिका नहीं होती, फिर भी अनेक महिलाएं आज भी तानों, अपमान और मानसिक प्रताड़ना का सामना करने को मजबूर हैं। कई मामलों में परिवार के सदस्य बेटे को दूसरी शादी करने के लिए भी दबाव डालते हैं, ताकि परिवार में पुत्र का जन्म हो सके। यह न केवल महिला के अधिकारों का उल्लंघन है बल्कि एक अमानवीय सामाजिक कुरीति भी है।

जितेंद्र कुशवाहा लेखक, समाजसेवी एवं संपादकसामाजिक जागरूकता टाइम्स

पुत्र मोह के कारण परिवारों में तनाव बढ़ता है, पति-पत्नी के संबंध प्रभावित होते हैं और कई बार बात तलाक तक पहुंच जाती है। जिन बेटियों को परिवार का आशीर्वाद और प्यार मिलना चाहिए, उन्हें ही समस्या की जड़ मान लिया जाता है। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। आखिर बेटियों का कसूर क्या है? क्या केवल इसलिए कि उनका जन्म बेटी के रूप में हुआ है?

वास्तविकता यह है कि आज की बेटियां हर क्षेत्र में देश का नाम रोशन कर रही हैं। शिक्षा, प्रशासन, राजनीति, सेना, खेल, विज्ञान और व्यापार जैसे क्षेत्रों में बेटियां नई ऊंचाइयों को छू रही हैं। अनेक परिवारों में बेटियां अपने माता-पिता की सेवा और जिम्मेदारियों का निर्वहन बेटों से भी बेहतर तरीके से कर रही हैं। फिर भी समाज का एक वर्ग पुरानी सोच से बाहर निकलने को तैयार नहीं है।

समय की मांग है कि हम अपनी मानसिकता में बदलाव लाएं। बेटा और बेटी दोनों समान हैं और दोनों को समान अवसर, सम्मान और अधिकार मिलने चाहिए। परिवारों को यह समझना होगा कि संतान ईश्वर का उपहार है, चाहे वह पुत्र हो या पुत्री। किसी भी महिला या बेटी को पुत्र न होने के कारण दोषी ठहराना अन्याय है।

यदि भारत को वास्तव में विकसित, शिक्षित और विश्वगुरु बनाना है, तो सबसे पहले समाज को पुत्र मोह जैसी संकीर्ण सोच से मुक्त होना होगा। बेटियों को बोझ नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की शक्ति के रूप में स्वीकार करना होगा। जिस दिन हम बेटा-बेटी के बीच भेदभाव समाप्त कर देंगे, उसी दिन सच्चे अर्थों में सामाजिक समानता और प्रगति का मार्ग प्रशस्त होगा।

आखिरकार, प्रश्न यही है कि जब बेटी का कोई दोष नहीं, तो उसे सजा क्यों? बेटियां भी उतनी ही अनमोल हैं जितने बेटे। उन्हें सम्मान, प्यार और समान अधिकार देना ही एक सभ्य और प्रगतिशील समाज की पहचान है।

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