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सोमवार, 22 जून 2026

पुत्र मोह के कारण बढ़ रहे तलाक, पारिवारिक कलह और बिखरता परिवार

 

पुत्र मोह और बेटियों के प्रति भेदभाव : आखिर बेटियों का कसूर क्या है?

भारत आज स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने का अमृत महोत्सव मना चुका है और विश्वगुरु बनने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है। शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक विकास के क्षेत्र में देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है। इसके बावजूद समाज के एक बड़े वर्ग में आज भी पुत्र मोह की मानसिकता गहराई से मौजूद है, जो अनेक पारिवारिक समस्याओं, कलह और यहां तक कि तलाक का कारण बन रही है।

आज भी कई परिवारों में यह धारणा बनी हुई है कि वंश को आगे बढ़ाने के लिए घर में पुत्र का होना आवश्यक है। बेटी के जन्म को खुशी के बजाय निराशा की दृष्टि से देखा जाता है। परिणामस्वरूप कई दंपति पुत्र प्राप्ति की चाह में लगातार संतान उत्पन्न करते रहते हैं। यदि परिवार में केवल बेटियां हों और पुत्र न हो, तो कई लोग परिवार को अधूरा मानते हैं। यह सोच न केवल बेटियों के सम्मान को ठेस पहुंचाती है बल्कि महिलाओं के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव डालती है।

सबसे दुखद स्थिति तब उत्पन्न होती है जब पुत्र न होने का दोष महिला पर मढ़ दिया जाता है। वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध हो चुका है कि संतान का लिंग निर्धारित होने में महिला की कोई भूमिका नहीं होती, फिर भी अनेक महिलाएं आज भी तानों, अपमान और मानसिक प्रताड़ना का सामना करने को मजबूर हैं। कई मामलों में परिवार के सदस्य बेटे को दूसरी शादी करने के लिए भी दबाव डालते हैं, ताकि परिवार में पुत्र का जन्म हो सके। यह न केवल महिला के अधिकारों का उल्लंघन है बल्कि एक अमानवीय सामाजिक कुरीति भी है।

जितेंद्र कुशवाहा लेखक, समाजसेवी एवं संपादकसामाजिक जागरूकता टाइम्स

पुत्र मोह के कारण परिवारों में तनाव बढ़ता है, पति-पत्नी के संबंध प्रभावित होते हैं और कई बार बात तलाक तक पहुंच जाती है। जिन बेटियों को परिवार का आशीर्वाद और प्यार मिलना चाहिए, उन्हें ही समस्या की जड़ मान लिया जाता है। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। आखिर बेटियों का कसूर क्या है? क्या केवल इसलिए कि उनका जन्म बेटी के रूप में हुआ है?

वास्तविकता यह है कि आज की बेटियां हर क्षेत्र में देश का नाम रोशन कर रही हैं। शिक्षा, प्रशासन, राजनीति, सेना, खेल, विज्ञान और व्यापार जैसे क्षेत्रों में बेटियां नई ऊंचाइयों को छू रही हैं। अनेक परिवारों में बेटियां अपने माता-पिता की सेवा और जिम्मेदारियों का निर्वहन बेटों से भी बेहतर तरीके से कर रही हैं। फिर भी समाज का एक वर्ग पुरानी सोच से बाहर निकलने को तैयार नहीं है।

समय की मांग है कि हम अपनी मानसिकता में बदलाव लाएं। बेटा और बेटी दोनों समान हैं और दोनों को समान अवसर, सम्मान और अधिकार मिलने चाहिए। परिवारों को यह समझना होगा कि संतान ईश्वर का उपहार है, चाहे वह पुत्र हो या पुत्री। किसी भी महिला या बेटी को पुत्र न होने के कारण दोषी ठहराना अन्याय है।

यदि भारत को वास्तव में विकसित, शिक्षित और विश्वगुरु बनाना है, तो सबसे पहले समाज को पुत्र मोह जैसी संकीर्ण सोच से मुक्त होना होगा। बेटियों को बोझ नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की शक्ति के रूप में स्वीकार करना होगा। जिस दिन हम बेटा-बेटी के बीच भेदभाव समाप्त कर देंगे, उसी दिन सच्चे अर्थों में सामाजिक समानता और प्रगति का मार्ग प्रशस्त होगा।

आखिरकार, प्रश्न यही है कि जब बेटी का कोई दोष नहीं, तो उसे सजा क्यों? बेटियां भी उतनी ही अनमोल हैं जितने बेटे। उन्हें सम्मान, प्यार और समान अधिकार देना ही एक सभ्य और प्रगतिशील समाज की पहचान है।

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