लेखक: समाजसेवी जितेंद्र कुशवाहा प्रकाशन: सामाजिक जागरूकता टाइम्स
"जिस समाज का युवा अपनी संस्कृति, भाषा और लोकनायकों को भूल जाता है, वह समाज अपनी पहचान भी धीरे-धीरे खो देता है।"
10 जुलाई 1971 को भोजपुरी साहित्य, लोकनाट्य और जनजागरण के महानायक भिखारी ठाकुर इस संसार से विदा हुए। उनकी विरासत आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में जीवित है। उनकी 55वीं पुण्यतिथि केवल एक महान लोक कलाकार को श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन करने का भी समय है कि आज का युवा उनके विचारों से क्या सीख सकता है।
भिखारी ठाकुर को केवल "भोजपुरी के शेक्सपियर" कहना पर्याप्त नहीं होगा। वे एक लेखक, लोकनाटककार, गीतकार, अभिनेता, निर्देशक और सबसे बढ़कर समाज सुधारक थे। उन्होंने उस दौर में समाज की उन समस्याओं को मंच पर उतारा, जिन पर खुलकर बात करना भी आसान नहीं था। बाल विवाह, दहेज प्रथा, बेटियों की खरीद-फरोख्त, पलायन, जातिगत भेदभाव, महिलाओं की पीड़ा और सामाजिक असमानता जैसे विषयों को उन्होंने लोकभाषा के माध्यम से आम लोगों तक पहुँचाया।
आज जब हम 21वीं सदी में खड़े हैं, तो यह प्रश्न उठता है कि क्या भिखारी ठाकुर के विचार आज भी प्रासंगिक हैं? मेरा उत्तर है—पहले से भी अधिक।
बदलता समय, वही चुनौतियाँ
आज तकनीक ने दुनिया को बदल दिया है। मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने युवाओं को वैश्विक मंच दे दिया है। लेकिन दूसरी ओर, समाज नई चुनौतियों से भी जूझ रहा है। बेरोज़गारी, नशे की बढ़ती प्रवृत्ति, सोशल मीडिया की लत, मानसिक तनाव, पारिवारिक दूरी, सांस्कृतिक विघटन और भाषा से बढ़ती दूरी युवाओं के सामने गंभीर प्रश्न बनकर खड़े हैं।
भिखारी ठाकुर का साहित्य हमें बताता है कि समाज की सबसे बड़ी ताकत उसकी संवेदनशीलता और सांस्कृतिक चेतना होती है। यदि युवा अपनी जड़ों से जुड़े रहेंगे, तो आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बना सकेंगे।
"बिदेसिया" आज भी क्यों प्रासंगिक है?
भिखारी ठाकुर का प्रसिद्ध नाटक "बिदेसिया" उस दौर के पलायन की कहानी था। आज भी लाखों युवा रोजगार, शिक्षा और बेहतर जीवन की तलाश में अपने गाँव और परिवार से दूर महानगरों या विदेशों में जाते हैं।
समय बदला है, लेकिन भावनाएँ नहीं बदलीं। आज भी माता-पिता अपने बच्चों के लौटने का इंतज़ार करते हैं। आज भी गाँव प्रतिभाओं के पलायन से खाली होते जा रहे हैं। इसलिए "बिदेसिया" केवल एक नाटक नहीं, बल्कि भारतीय समाज की एक सतत सच्चाई है।
आज के युवाओं को यह समझना होगा कि सफलता केवल बड़े शहरों में नहीं, बल्कि अपने समाज और अपने क्षेत्र के विकास में योगदान देने में भी है।
बेटियों के सम्मान का संदेश
भिखारी ठाकुर का "बेटी बेचवा" केवल एक नाटक नहीं था, बल्कि समाज के सामने एक आईना था। उन्होंने उस समय बेटियों के अधिकारों की बात की, जब महिलाओं की आवाज़ को अक्सर दबा दिया जाता था।
आज परिस्थितियाँ बदली हैं। बेटियाँ शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन, खेल और राजनीति हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। फिर भी दहेज, भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा और लैंगिक भेदभाव जैसी समस्याएँ पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं।
आज के युवा यदि वास्तव में भिखारी ठाकुर को श्रद्धांजलि देना चाहते हैं, तो उन्हें महिलाओं के सम्मान, समान अवसर और सुरक्षित समाज के निर्माण का संकल्प लेना होगा।
अपनी भाषा पर गर्व करें
भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी को केवल बोली नहीं माना, बल्कि जनभावनाओं की भाषा बनाया। उन्होंने सिद्ध किया कि मातृभाषा में समाज की आत्मा बसती है।
आज का युवा अंग्रेज़ी और आधुनिक शिक्षा अवश्य प्राप्त करे, लेकिन अपनी मातृभाषा—चाहे वह भोजपुरी, मगही, मैथिली, अवधी, ब्रज, हरियाणवी या कोई अन्य भारतीय भाषा हो—पर गर्व करना भी उतना ही आवश्यक है।
जो युवा अपनी भाषा और संस्कृति का सम्मान करता है, वही दुनिया के सामने अपनी अलग पहचान बना सकता है।
सोशल मीडिया का सकारात्मक उपयोग
यदि आज भिखारी ठाकुर जीवित होते, तो संभवतः वे भी सोशल मीडिया का उपयोग समाज सुधार के लिए करते। वे छोटे-छोटे वीडियो, लोकगीत, नाटक और संवादों के माध्यम से करोड़ों लोगों तक अपना संदेश पहुँचाते।
आज के युवाओं के हाथ में मोबाइल है। प्रश्न यह नहीं कि मोबाइल अच्छा है या बुरा। प्रश्न यह है कि उसका उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है।
यदि सोशल मीडिया पर नफ़रत के बजाय जागरूकता, अश्लीलता के बजाय संस्कृति, अफवाहों के बजाय सत्य और नकारात्मकता के बजाय प्रेरणा साझा की जाए, तो वही भिखारी ठाकुर के विचारों का वास्तविक विस्तार होगा।
समाज सेवा ही सच्ची श्रद्धांजलि
भिखारी ठाकुर ने समाज की पीड़ा को महसूस किया। उन्होंने केवल समस्याएँ नहीं गिनाईं, बल्कि लोगों को सोचने और बदलने की प्रेरणा दी।
आज का युवा यदि किसी गरीब बच्चे की शिक्षा में सहयोग करता है, किसी जरूरतमंद परिवार की सहायता करता है, रक्तदान करता है, पर्यावरण संरक्षण में भाग लेता है, नशा मुक्ति अभियान चलाता है या सामाजिक एकता के लिए कार्य करता है, तो यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
संस्कृति और आधुनिकता का संतुलन
आधुनिक बनना आवश्यक है, लेकिन अपनी संस्कृति को छोड़ देना बुद्धिमानी नहीं है। भिखारी ठाकुर हमें सिखाते हैं कि आधुनिक विचारों को अपनाते हुए भी अपनी लोक परंपरा, लोककला और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखा जा सकता है।
आज का युवा यदि लोकगीत, लोकनृत्य, लोकनाटक और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को आगे बढ़ाएगा, तो आने वाली पीढ़ियाँ भी अपनी पहचान पर गर्व करेंगी।
युवाओं के लिए पाँच संदेश
भिखारी ठाकुर के जीवन से आज का युवा पाँच महत्वपूर्ण बातें सीख सकता है—
संघर्ष से कभी मत डरिए।
अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व कीजिए।
समाज की समस्याओं के प्रति संवेदनशील बनिए।
महिलाओं का सम्मान और समानता सुनिश्चित कीजिए।
अपनी प्रतिभा का उपयोग केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि समाज के विकास के लिए भी कीजिए।
आज की सबसे बड़ी आवश्यकता
आज देश को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो केवल नौकरी खोजने वाले नहीं, बल्कि समाज बदलने वाले हों; जो केवल सोशल मीडिया पर सक्रिय न हों, बल्कि समाज के बीच भी सक्रिय हों; जो केवल सफलता की बात न करें, बल्कि जिम्मेदारी भी निभाएँ।
भिखारी ठाकुर का जीवन हमें यही प्रेरणा देता है कि सीमित संसाधनों के बावजूद यदि इरादे मजबूत हों, तो एक साधारण व्यक्ति भी इतिहास रच सकता है।
मैं सभी युवाओं से आग्रह करता हूँ कि अपने मोबाइल की स्क्रीन से बाहर निकलकर समाज की वास्तविक समस्याओं को भी देखें। शिक्षा प्राप्त करें, आत्मनिर्भर बनें, अपने माता-पिता का सम्मान करें, अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ें तथा समाज में सकारात्मक परिवर्तन के वाहक बनें।
भिखारी ठाकुर ने कलम और मंच को समाज परिवर्तन का माध्यम बनाया था। आज हमारे पास तकनीक, शिक्षा और अवसर हैं। यदि हम इन साधनों का उपयोग जनजागरण, सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण के लिए करें, तो यही उनके सपनों के भारत की दिशा में हमारा योगदान होगा।
आइए, भिखारी ठाकुर की 55वीं पुण्यतिथि पर हम यह संकल्प लें कि उनकी लोकचेतना, सामाजिक न्याय और मानवीय मूल्यों की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाएँगे। यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें