नई दिल्ली। दिल्ली की राजनीति में पूर्वांचल समाज की संख्या लगातार बढ़ने के बावजूद उसके अनुरूप राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व न के बराबर है। यह बात समाजसेवी एवं सामाजिक कार्यकर्ता जितेन्द्र कुशवाहा ने एक संवाद कार्यक्रम के दौरान कही। उन्होंने कहा कि दिल्ली के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में पूर्वांचल समाज निर्णायक भूमिका में है, इसके बावजूद नीतिगत निर्णयों, नेतृत्व और सत्ता संरचना में उसकी हिस्सेदारी बेहद सीमित है।
जितेन्द्र कुशवाहा ने कहा कि पूर्वांचल समाज मेहनतकश, ईमानदार और विकास को प्राथमिकता देने वाला समाज है। शिक्षा, स्वास्थ्य, निर्माण, परिवहन और सेवा क्षेत्रों में इस समाज का बड़ा योगदान है, लेकिन राजनीतिक दल चुनाव के समय केवल वोट बैंक के रूप में इसका उपयोग करते हैं। चुनाव समाप्त होते ही समाज की समस्याएं, जैसे शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाएं, झुग्गी-झोपड़ी पुनर्वास और सामाजिक सम्मान, हाशिये पर चली जाती हैं।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे पूर्वांचल समाज को केवल भीड़ नहीं, बल्कि नेतृत्व के रूप में स्वीकार करें। विधानसभा, नगर निगम और संगठनात्मक स्तर पर समाज के योग्य, शिक्षित और संघर्षशील युवाओं को आगे लाया जाए। इससे न केवल लोकतंत्र मजबूत होगा, बल्कि दिल्ली का समग्र विकास भी संभव होगा।
जितेन्द्र कुशवाहा ने पूर्वांचल समाज से भी आह्वान किया कि वह जाति, क्षेत्र और दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बने। शिक्षा, संगठन और एकजुटता के माध्यम से ही राजनीतिक उपेक्षा को समाप्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि जब तक समाज स्वयं नेतृत्व तैयार नहीं करेगा, तब तक उसकी आवाज सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंचेगी।