नई दिल्ली ,माउंटेन मैन’ के नाम से विश्वविख्यात स्वर्गीय दशरथ मांझी जी की जयंती के अवसर पर देशभर में उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण किया गया। दशरथ मांझी जी ने सिर्फ हथौड़ा और छेनी की मदद से 22 वर्षों की अथक मेहनत कर पहाड़ को काटकर रास्ता बनाकर यह सिद्ध कर दिया कि मजबूत इच्छाशक्ति के आगे असंभव शब्द निरर्थक हो जाता है। उनका जीवन संघर्ष, धैर्य, प्रेम और जनकल्याण के प्रति समर्पण की अनुपम मिसाल है।
इस अवसर पर समाजसेवी जितेन्द्र कुशवाहा ने दशरथ मांझी जी को नमन करते हुए कहा कि मांझी जी का संघर्ष केवल एक रास्ता बनाने तक सीमित नहीं था, बल्कि यह सामाजिक विषमता, भौगोलिक बाधाओं और व्यवस्था की उदासीनता के खिलाफ एक शांत लेकिन दृढ़ क्रांति थी। उन्होंने अपने व्यक्तिगत दुख को समाज के हित में बदलकर यह दिखाया कि सच्चा बदलाव सत्ता या संसाधनों से नहीं, बल्कि संकल्प से आता है।
जितेन्द्र कुशवाहा ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आज के युवाओं को दशरथ मांझी जी के जीवन से सीख लेनी चाहिए। मांझी जी का जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मन में जनसेवा की भावना हो तो हर बाधा को पार किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि विकास केवल बड़ी योजनाओं या घोषणाओं से नहीं होता, बल्कि जमीनी स्तर पर किए गए ईमानदार प्रयासों से होता है, जैसा कि दशरथ मांझी जी ने करके दिखाया।
उन्होंने आगे कहा कि आज आवश्यकता है मांझी जी की सोच को आत्मसात करने की—जहां व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए कार्य करे। दशरथ मांझी जी का अतुलनीय योगदान आने वाले समय में भी देश और दुनिया को प्रेरणा देता रहेगा।
अंत में, जितेन्द्र कुशवाहा ने कहा कि दशरथ मांझी जी जैसे महापुरुषों की जयंती केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि उनके विचारों को जीवन में उतारने का संकल्प लेने का दिन है।

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