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गुरुवार, 11 जून 2026

बेटी होने पर तिरस्कार और नवरात्रों में कन्या-पूजन: समाज की दोहरी मानसिकता-जितेन्द्र कुशवाहा

लेखक : जितेन्द्र कुशवाहा , नई दिल्ली

भारतीय समाज में नारी को शक्ति, सृजन और संस्कृति का आधार माना जाता है। हमारे धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में कन्या को देवी का स्वरूप बताया गया है। विशेष रूप से नवरात्रों के दौरान कन्या-पूजन की परंपरा इस विश्वास को और मजबूत करती है कि बेटी सम्मान और श्रद्धा की प्रतीक है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस समाज में कन्याओं की पूजा की जाती है, उसी समाज में बेटी के जन्म पर अनेक परिवारों में दुःख व्यक्त किया जाता है और बहू को तिरस्कार एवं मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है।

आज शिक्षा, विज्ञान और तकनीकी विकास के इस युग में भी पुत्र-मोह का प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। अनेक परिवारों में अब भी यह धारणा प्रचलित है कि वंश केवल पुत्र से ही आगे बढ़ सकता है। परिणामस्वरूप बेटी के जन्म को निराशा की दृष्टि से देखा जाता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि संतान के लिंग निर्धारण के लिए महिलाओं को दोषी ठहराया जाता है, जबकि वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध हो चुका है कि संतान का लिंग निर्धारण माता नहीं, बल्कि पिता के गुणसूत्रों पर निर्भर करता है।

समाज में ऐसे अनेक उदाहरण देखने और सुनने को मिलते हैं जहाँ दो या अधिक बेटियों के जन्म के बाद परिवार के कुछ सदस्य पुत्र-प्राप्ति की चाह में दूसरी शादी की बात करने लगते हैं। कई बार पहली पत्नी को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है, उसे परिवार से अलग रहने के लिए मजबूर किया जाता है या उसके साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है कि वह स्वयं को परिवार का हिस्सा ही न समझे। कुछ मामलों में परिवार के बुजुर्ग अपने पुत्र पर दूसरी शादी का दबाव भी बनाते हैं। यह प्रवृत्ति न केवल महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि मानवीय मूल्यों और सामाजिक न्याय की भावना के भी विरुद्ध है।

यह स्थिति समाज की दोहरी मानसिकता को उजागर करती है। एक ओर कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर पूजा जाता है और दूसरी ओर बेटी के जन्म पर बहू को अपमानित किया जाता है। यदि बेटियाँ वास्तव में पूजनीय हैं, तो उन्हें जन्म देने वाली माँ का सम्मान भी उतना ही आवश्यक है। पूजा और व्यवहार के बीच यह विरोधाभास हमारी सामाजिक चेतना पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

पुत्र-प्राथमिकता की यह सोच केवल पारिवारिक समस्या नहीं है, बल्कि समाज के भविष्य से जुड़ा गंभीर विषय है। यदि बेटियों के प्रति भेदभाव की मानसिकता बनी रही तो लिंगानुपात में असंतुलन और अधिक बढ़ सकता है। महिलाओं की घटती संख्या सामाजिक असंतुलन, अपराधों और अनेक मानवीय समस्याओं को जन्म दे सकती है। इसलिए यह आवश्यक है कि समाज समय रहते इस खतरे को समझे।

महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के लिए देश में अनेक कानूनी प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन पुत्र-प्राप्ति के नाम पर होने वाले मानसिक उत्पीड़न, सामाजिक बहिष्कार और वैवाहिक शोषण के मामलों में कानूनों के कठोर और प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता है। यदि किसी महिला को केवल बेटियों की माँ होने के कारण प्रताड़ित किया जाता है या दूसरी शादी के लिए दबाव बनाया जाता है, तो ऐसे मामलों में सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।

हालाँकि केवल कानूनों के भरोसे सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं है। इसके लिए समाज में व्यापक जागरूकता, वैज्ञानिक सोच और लैंगिक समानता की भावना को विकसित करना होगा। परिवार, विद्यालय, सामाजिक संस्थाएँ, धार्मिक मंच और मीडिया सभी को मिलकर यह संदेश देना होगा कि बेटी और बेटा दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं तथा दोनों ही समाज और राष्ट्र के विकास में समान योगदान देते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी सोच और व्यवहार के बीच की दूरी को समाप्त करें। जब बेटी के जन्म पर भी उतनी ही खुशी मनाई जाएगी जितनी बेटे के जन्म पर मनाई जाती है, तभी सच्चे अर्थों में सामाजिक प्रगति संभव होगी। किसी भी महिला का सम्मान उसकी संतान के लिंग के आधार पर नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व, संघर्ष और योगदान के आधार पर होना चाहिए।

बेटी बोझ नहीं, भविष्य की आधारशिला है। जो समाज अपनी बेटियों का सम्मान करता है, वही वास्तव में सभ्य, संवेदनशील और प्रगतिशील समाज कहलाने का अधिकार रखता है।


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