संजय भाई ने कहा कि मगही भाषा आज सरकारी उपेक्षा के कारण धीरे-धीरे विलुप्ति के कगार पर पहुंच रही है। यह भाषा भारत की प्राचीन सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत की महत्वपूर्ण धरोहर है। इसके संरक्षण, शोध, अध्ययन और प्रचार-प्रसार के लिए एक समर्पित मगही विश्वविद्यालय की स्थापना अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतनी समृद्ध भाषा होने के बावजूद आज तक मगही भाषा को UGC-NET में स्थान नहीं मिल पाया है। जबकि मगही भाषा का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है। यह प्राचीन मगध साम्राज्य की लोकभाषा रही है तथा भगवान बुद्ध और भगवान महावीर की ज्ञानभूमि से इसका गहरा संबंध रहा है।
संजय भाई ने कहा कि मगही भाषा बिहार के नालंदा, गया, नवादा, जहानाबाद, अरवल, पटना, शेखपुरा, मुंगेर, जमुई और लखीसराय सहित अनेक जिलों में व्यापक रूप से बोली जाती है। इसके अलावा झारखंड के हजारीबाग, चतरा, कोडरमा, पलामू, गढ़वा, बोकारो और धनबाद सहित कई क्षेत्रों में लाखों लोग अपनी मातृभाषा के रूप में मगही का प्रयोग करते हैं।
उन्होंने केंद्र एवं बिहार सरकार से आग्रह किया कि मगही भाषा को शिक्षा, अनुसंधान और रोजगार से जोड़ने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। साथ ही UGC-NET में मगही विषय को शामिल करने तथा मगही विश्वविद्यालय की स्थापना की दिशा में शीघ्र पहल की जाए।
संजय भाई ने मगही भाषा से जुड़े साहित्यकारों, शिक्षकों, शोधार्थियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं युवाओं से आह्वान किया कि वे मगही भाषा आंदोलन से जुड़कर अपनी मातृभाषा के संरक्षण और सम्मान के लिए एकजुट होकर आवाज बुलंद करें।
इस मांग का समर्थन शोधार्थी शिशुपाल, प्रो. नागेंद्र कुमार, डॉ. आनंद वर्धन, कुंज बिहारी लाल, दीपक कुमार, भैया अजीत, उमराव प्रसाद निर्मल (पूर्व पार्षद), रंगेश कुमार शर्मा (पूर्व सरपंच), राम विष्णु सिंह (मंत्रीजी), एडवोकेट रणविजय सिंह यादव, संजीव मुकेश (कवि), राकेश बिहारी शर्मा (साहित्यकार) तथा गायत्री शर्मा उर्फ राकेश पासवान सहित अनेक बुद्धिजीवियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने किया है।

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