Breaking News / सूचना

Loading today's news...
🚨 अपनी खबर, प्रेस विज्ञप्ति, फोटो एवं वीडियो प्रकाशित कराने के लिए WhatsApp करें 📲 9891374341 | Email id: samajikjagruktatimes@gmail.com

मंगलवार, 21 जुलाई 2026

अनशन और सरकार का सामाजिक दायित्व: लोकतंत्र में संवाद की अहमियत

 

अनशन और सरकार का सामाजिक दायित्व पर विचार लेख | लोकतंत्र, संविधान और जनसंवाद
नई दिल्ली | 21 जुलाई, 2026 लोकतंत्र केवल सरकार बनाने की व्यवस्था नहीं है; यह नागरिकों और शासन के बीच विश्वास, संवाद, संवेदनशीलता और जवाबदेही का सतत अनुबंध है। चुनाव लोकतंत्र की शुरुआत हैं, उसका अंत नहीं। लोकतंत्र तब जीवंत रहता है जब सरकार जनता की बात सुनती है, नागरिक जिम्मेदारी के साथ अपनी बात रखते हैं और संस्थाएँ निष्पक्ष होकर जनहित में कार्य करती हैं।जब यह संवाद कमजोर पड़ता है, जब शिकायतें वर्षों तक फाइलों में दब जाती हैं, जब प्रशासन जनभावनाओं से कटने लगता है और जब लोगों को अपनी आवाज़ सुनाने के लिए सड़क पर बैठना पड़ता है, तब लोकतंत्र स्वयं से प्रश्न करता है। ऐसे समय में अनशन केवल विरोध नहीं होता; वह व्यवस्था के सामने खड़ा एक नैतिक प्रश्न होता है।

भारत का इतिहास बताता है कि इस देश में अनशन सत्ता के विरुद्ध युद्ध नहीं, बल्कि अंतरात्मा को जगाने का प्रयास रहा है। महात्मा गांधी ने इसे सत्याग्रह का माध्यम बनाया। उनके लिए अनशन किसी को पराजित करने का साधन नहीं था, बल्कि स्वयं कष्ट सहकर समाज और सत्ता के विवेक को जगाने का प्रयास था। यही कारण है कि भारतीय लोकतंत्र में अनशन को एक नैतिक और अहिंसक प्रतिरोध के रूप में सम्मान मिला।

स्वतंत्र भारत में भी समय-समय पर अनेक सामाजिक आंदोलनों ने अनशन का सहारा लिया। किसानों, मजदूरों, छात्रों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों ने विभिन्न मुद्दों पर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखी। इससे यह स्पष्ट होता है कि लोकतंत्र में असहमति कोई कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी स्वाभाविक विशेषता है।भारतीय संविधान भी नागरिकों को अपनी बात रखने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण और बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार प्रदान करता है। वहीं अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति के जीवन और गरिमा की रक्षा की बात करता है। इन संवैधानिक मूल्यों का अर्थ यही है कि सरकार नागरिकों की आवाज़ सुने और नागरिक संविधानसम्मत तरीके से अपनी बात रखें।हालाँकि संविधान कोई भी अधिकार पूर्ण रूप से निरंकुश नहीं मानता। सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा, नैतिकता और अन्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। इसलिए लोकतंत्र में अधिकार और उत्तरदायित्व साथ-साथ चलते हैं।यहीं सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होती है।

AIIMS के पूर्व निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया की मौजूदगी में डॉ. विभु आनंद विश्वास सम्मानित

सरकार का दायित्व केवल योजनाएँ बनाना, बजट प्रस्तुत करना और कानून लागू करना नहीं है। उसका सामाजिक दायित्व इससे कहीं अधिक व्यापक है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई नागरिक अपनी समस्या लेकर वर्षों तक भटकने के बाद अनशन करने को मजबूर न हो। यदि किसी व्यक्ति या संगठन को बार-बार ज्ञापन देने, अधिकारियों से मिलने और न्याय की प्रतीक्षा करने के बावजूद समाधान नहीं मिलता, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का विषय है।एक संवेदनशील सरकार विरोध को शत्रुता नहीं मानती। वह यह समझती है कि असहमति लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। विरोध करने वाला प्रत्येक व्यक्ति सरकार का विरोधी नहीं होता; वह व्यवस्था में सुधार की अपेक्षा रखने वाला नागरिक भी हो सकता है। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह ऐसे आंदोलनों के प्रति संवाद, धैर्य और पारदर्शिता का परिचय दे।इतिहास गवाह है कि जहाँ संवाद समाप्त होता है, वहाँ अविश्वास जन्म लेता है। और जहाँ अविश्वास बढ़ता है, वहाँ लोकतंत्र कमजोर होने लगता है। इसलिए किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की पहली जिम्मेदारी संवाद के सभी रास्ते खुले रखना है।

साथ ही, यह अपेक्षा केवल सरकार से नहीं की जा सकती। अनशन करने वाले व्यक्तियों और संगठनों की भी नैतिक जिम्मेदारी है कि उनका आंदोलन संविधानसम्मत, अहिंसक और जनहितकारी हो। किसी भी आंदोलन की विश्वसनीयता उसकी भाषा, उसके आचरण और उसके उद्देश्य से तय होती है। यदि आंदोलन हिंसा, नफरत, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या सामाजिक वैमनस्य का माध्यम बन जाए, तो उसका नैतिक आधार कमजोर पड़ जाता है।

EET UG 2026: नवादा के आयुष भालोटिया ने AIR 4 हासिल कर रचा इतिहास, 710 अंक के साथ बने प्रेरणा स्रोत

लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। मीडिया केवल सूचना देने वाला माध्यम नहीं, बल्कि समाज और सरकार के बीच संवाद का सेतु है। इसलिए पत्रकारिता का उद्देश्य किसी आंदोलन को सनसनीखेज बनाना नहीं, बल्कि उसके वास्तविक कारणों, तथ्यों और संभावित समाधानों को सामने लाना होना चाहिए। लोकतंत्र में जिम्मेदार मीडिया सामाजिक तनाव कम करने और समाधान का वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

डिजिटल युग में सोशल मीडिया ने नागरिकों को अभिव्यक्ति का नया मंच दिया है। लेकिन इसके साथ बड़ी जिम्मेदारी भी आई है। अपुष्ट सूचनाएँ, भ्रामक वीडियो और भावनात्मक संदेश कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाते हैं। इसलिए नागरिकों का कर्तव्य है कि वे केवल सत्यापित जानकारी साझा करें और सामाजिक सद्भाव बनाए रखें।

आज भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यह गौरव केवल जनसंख्या या चुनावों के कारण नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के कारण है। इन मूल्यों की रक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें नागरिक समाज, न्यायपालिका, मीडिया, शैक्षणिक संस्थानों और प्रत्येक नागरिक की समान भागीदारी आवश्यक है।

सरकार की सफलता केवल आर्थिक विकास, बड़े निर्माण कार्यों या योजनाओं से नहीं मापी जा सकती। उसकी वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि आम नागरिक को न्याय कितनी आसानी से मिलता है, उसकी शिकायत कितनी जल्दी सुनी जाती है और उसकी गरिमा का कितना सम्मान किया जाता है।

यदि किसी लोकतंत्र में लोग अपनी बात कहने से डरने लगें, तो वह लोकतंत्र कमजोर हो जाता है। और यदि सरकार आलोचना सुनने की क्षमता खो दे, तो लोकतांत्रिक संस्थाएँ भी धीरे-धीरे अपना विश्वास खोने लगती हैं। इसलिए असहमति का सम्मान लोकतंत्र की मजबूरी नहीं, उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

आज आवश्यकता किसी पक्ष या विपक्ष की राजनीति से ऊपर उठकर लोकतांत्रिक संस्कृति को मजबूत करने की है। सरकार को संवाद को प्राथमिकता देनी होगी, प्रशासन को जवाबदेह बनना होगा, नागरिकों को संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करना होगा और मीडिया को निष्पक्षता की कसौटी पर खरा उतरना होगा।

अनशन किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की पराजय नहीं, बल्कि उसे आत्ममंथन का अवसर देने वाला नैतिक दर्पण है। यदि सरकार जनभावनाओं को समझते हुए समय पर संवाद स्थापित करे, समस्याओं का समाधान निकाले और नागरिक भी शांतिपूर्ण तथा जिम्मेदार आचरण बनाए रखें, तो अनशन की आवश्यकता स्वतः कम हो जाएगी। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति सत्ता नहीं, बल्कि विश्वास है; और विश्वास का निर्माण केवल संवाद, संवेदनशीलता, पारदर्शिता और न्याय से ही संभव है। यही सरकार का वास्तविक सामाजिक दायित्व है और यही एक सशक्त लोकतंत्र की पहचान भी।

— जितेन्द्र कुशवाहा
सामाजिक कार्यकर्ता एवं संपादक
सामाजिक जागरूकता टाइम्स



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

सभी नारी शक्ति की प्रेरणा स्रोत हैं माता सावित्रीबाई फुले : सविता सिंह कुशवाहा

  सविता सिंह कुशवाहा, उपाध्यक्ष, संसार जनकल्याण एक किरण फाउंडेशन   नई दिल्ली  भारत की सामाजिक और शैक्षणिक क्रांति के इतिहास में यदि किसी महा...

प्रिय पाठकों, आपका स्वागत है।

🙏 पढ़ने के लिए धन्यवाद। सामाजिक जागरूकता टाइम्स के साथ जुड़े रहें।🙏