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उन्होंने कहा कि माता सावित्रीबाई फुले केवल एक शिक्षिका नहीं थीं, बल्कि वे सामाजिक परिवर्तन की अग्रदूत थीं। उन्होंने समाज की उन कुरीतियों को चुनौती दी, जो महिलाओं को घर की चारदीवारी तक सीमित रखना चाहती थीं। जब लोग बेटियों को विद्यालय भेजने के विरोध में थे, तब उन्होंने अपने पति महात्मा ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर भारत का पहला बालिका विद्यालय प्रारम्भ किया। यह केवल एक विद्यालय नहीं था, बल्कि महिलाओं के सम्मान और समान अधिकारों की शुरुआत थी।
सविता सिंह कुशवाहा ने कहा कि इतिहास गवाह है कि जब सावित्रीबाई फुले पढ़ाने जाती थीं, तब कट्टरपंथी लोग उन पर पत्थर, कीचड़ और गोबर तक फेंकते थे। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वे अपने साथ एक अतिरिक्त साड़ी लेकर निकलती थीं ताकि विद्यालय पहुँचकर गंदी हुई साड़ी बदल सकें और पूरे आत्मविश्वास के साथ छात्राओं को शिक्षा दे सकें। यह घटना हमें सिखाती है कि समाज परिवर्तन का मार्ग कभी आसान नहीं होता, लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति और सकारात्मक सोच से हर कठिनाई को पार किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि आज जब देश की बेटियाँ डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, प्रोफेसर, न्यायाधीश, पुलिस अधिकारी, सैन्य अधिकारी, खिलाड़ी, पत्रकार और जनप्रतिनिधि बन रही हैं, तब हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस परिवर्तन की शुरुआत सावित्रीबाई फुले ने ही की थी। उन्होंने समाज को यह संदेश दिया कि यदि एक बेटी शिक्षित होती है, तो पूरा परिवार शिक्षित होता है और जब परिवार शिक्षित होगा, तभी राष्ट्र प्रगति करेगा।
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सविता सिंह कुशवाहा ने कहा कि आज भी देश के कई हिस्सों में बाल विवाह, दहेज प्रथा, लैंगिक भेदभाव, महिला हिंसा और शिक्षा से वंचित रहने जैसी समस्याएँ मौजूद हैं। इन चुनौतियों का समाधान केवल कानून से नहीं, बल्कि शिक्षा और सामाजिक जागरूकता से संभव है। माता सावित्रीबाई फुले का जीवन हमें यही प्रेरणा देता है कि समाज में समान अवसर और समान सम्मान तभी मिलेगा, जब हर बेटी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध होगी।
उन्होंने कहा कि हमें केवल सावित्रीबाई फुले की जयंती या पुण्यतिथि पर उन्हें याद नहीं करना चाहिए, बल्कि उनके विचारों को अपने जीवन में उतारना चाहिए। प्रत्येक परिवार का यह संकल्प होना चाहिए कि वह अपनी बेटी को उच्च शिक्षा दिलाएगा, उसके सपनों का सम्मान करेगा और उसे आत्मनिर्भर बनने का अवसर देगा। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
सविता सिंह कुशवाहा ने यह भी कहा कि समाज में महिलाओं की भागीदारी केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्हें नेतृत्व, प्रशासन, सामाजिक सेवा, राजनीति, विज्ञान, उद्यमिता और निर्णय लेने की प्रत्येक प्रक्रिया में समान अवसर मिलना चाहिए। जब महिलाओं को समान अधिकार और सम्मान मिलेगा, तभी भारत वास्तव में विकसित और समतामूलक राष्ट्र बन सकेगा।
उन्होंने कहा कि आज देश की नई शिक्षा नीति भी बेटियों की शिक्षा पर विशेष बल देती है। सरकार की विभिन्न योजनाएँ—जैसे 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ', छात्रवृत्ति योजनाएँ तथा महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम—तभी सफल होंगे जब समाज स्वयं अपनी सोच बदलेगा। समाज की मानसिकता में परिवर्तन लाने के लिए माता सावित्रीबाई फुले के विचार आज पहले से भी अधिक प्रासंगिक हैं।
उपाध्यक्ष, संसार जनकल्याण एक किरण फाउंडेशन
उन्होंने कहा कि संसार जनकल्याण एक किरण फाउंडेशन निरंतर महिलाओं और बालिकाओं के शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन तथा सामाजिक जागरूकता के लिए कार्य कर रहा है। संस्था का उद्देश्य केवल सहायता प्रदान करना नहीं, बल्कि महिलाओं को आत्मनिर्भर, शिक्षित और आत्मविश्वासी बनाना है। संस्था समय-समय पर महिला जागरूकता अभियान, शिक्षा सहायता, कौशल विकास, स्वास्थ्य शिविर तथा सामाजिक चेतना कार्यक्रम आयोजित करती है, ताकि समाज में समानता और सम्मान की भावना मजबूत हो।
सविता सिंह कुशवाहा ने युवाओं से भी विशेष अपील करते हुए कहा कि वे सोशल मीडिया और आधुनिक तकनीक का उपयोग केवल मनोरंजन तक सीमित न रखें, बल्कि समाज में शिक्षा, महिला सम्मान और सामाजिक जागरूकता का संदेश फैलाने का माध्यम बनाएं। यदि युवा पीढ़ी सावित्रीबाई फुले के विचारों को अपनाती है, तो आने वाला भारत और अधिक शिक्षित, जागरूक तथा समानता पर आधारित होगा।
उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि हम हर बेटी को यह विश्वास दिलाएँ कि वह किसी से कम नहीं है। उसे अपने सपनों को पूरा करने का पूरा अधिकार है और समाज का दायित्व है कि वह उसके मार्ग की बाधाएँ दूर करे। जब प्रत्येक बेटी सुरक्षित, शिक्षित और आत्मनिर्भर होगी, तभी भारत विश्व में वास्तविक अर्थों में एक विकसित और सशक्त राष्ट्र के रूप में स्थापित होगा।
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अंत में सविता सिंह कुशवाहा ने कहा कि माता सावित्रीबाई फुले का जीवन केवल महिलाओं के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने अपने संघर्ष से यह सिद्ध किया कि शिक्षा सबसे बड़ी शक्ति है और ज्ञान से ही सामाजिक परिवर्तन संभव है। आज हम जिस आधुनिक भारत का सपना देखते हैं, उसकी मजबूत नींव सावित्रीबाई फुले जैसे महान समाज सुधारकों ने रखी है। इसलिए प्रत्येक नागरिक का यह नैतिक दायित्व है कि वह उनके विचारों को जन-जन तक पहुँचाए और शिक्षा, समानता तथा महिला सम्मान के उनके मिशन को आगे बढ़ाए।
माता सावित्रीबाई फुले का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है—"शिक्षित बनो, जागरूक बनो और समाज को समानता की राह पर आगे बढ़ाओ।" यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
रिपोर्ट : जितेन्द्र कुशवाहा
संपादक, सामाजिक जागरूकता टाइम्स






