लेखक: जितेंद्र कुशवाहा प्रकाशन तिथि: 13 जुलाई 2026
प्रस्तावना
"एक बिहारी कब प्रवासी बन गया, उसे पता ही नहीं चला।" यह केवल एक भावनात्मक वाक्य नहीं है, बल्कि करोड़ों बिहारियों की जीवन यात्रा का सार है। बिहार की धरती ने दुनिया को ज्ञान, संस्कृति, लोकतंत्र, आध्यात्म और महान व्यक्तित्व दिए। इसी भूमि पर भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ, भगवान महावीर ने अहिंसा का संदेश दिया, सम्राट अशोक ने मानवता और सुशासन की मिसाल कायम की, आर्यभट्ट ने गणित और खगोल विज्ञान को नई दिशा दी, और नालंदा तथा विक्रमशिला जैसे विश्वविख्यात विश्वविद्यालयों ने पूरी दुनिया को शिक्षा का प्रकाश दिया।
लेकिन विडंबना यह है कि जिस भूमि ने विश्व को ज्ञान दिया, उसी भूमि के करोड़ों लोग आज अपने ही देश में रोज़गार और बेहतर जीवन की तलाश में घर छोड़ने को मजबूर हैं। वे दिल्ली, मुंबई, पंजाब, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, तमिलनाडु और देश के अन्य राज्यों में काम करते हैं। विदेशों तक भी बिहारियों ने अपनी मेहनत और प्रतिभा का लोहा मनवाया है। फिर भी उनकी पहचान अक्सर "प्रवासी" के रूप में होती है।
यह प्रश्न आज भी मन को झकझोरता है—आख़िर एक बिहारी कब प्रवासी बन गया?
बिहार का गौरवशाली इतिहास
बिहार केवल एक राज्य नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की आत्मा है। प्राचीन काल में इसे मगध के नाम से जाना जाता था। इसी धरती से मौर्य और गुप्त जैसे शक्तिशाली साम्राज्यों ने पूरे भारत को एकता के सूत्र में पिरोया। नालंदा विश्वविद्यालय में विश्व के अनेक देशों से विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे।
बिहार ने साहित्य, राजनीति, समाज सुधार, कृषि, विज्ञान और संस्कृति के क्षेत्र में देश को अमूल्य योगदान दिया है। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से लेकर लोकनायक जयप्रकाश नारायण तक अनेक महान व्यक्तित्व बिहार की धरती से निकले। यह इतिहास बिहार की क्षमता का प्रमाण है।
प्रवास की शुरुआत
स्वतंत्रता के बाद देश का विकास समान रूप से नहीं हुआ। कई राज्यों में उद्योग, शिक्षा और आधारभूत संरचना तेजी से विकसित हुई, जबकि बिहार अनेक कारणों से अपेक्षित गति नहीं पकड़ सका। बाढ़, सुखाड़, सीमित औद्योगिक निवेश, रोजगार के अवसरों की कमी और कमजोर आधारभूत संरचना ने युवाओं को राज्य से बाहर जाने के लिए प्रेरित किया।
पहले कुछ लोग रोजगार के लिए बाहर गए। फिर यह एक परंपरा बन गई। गाँव का एक व्यक्ति बाहर गया, फिर उसने अपने रिश्तेदारों और परिचितों को बुलाया। धीरे-धीरे लगभग हर परिवार का कोई न कोई सदस्य बिहार से बाहर रहने लगा।
मजबूरी नहीं, संघर्ष की कहानी
बिहार से बाहर जाने वाला व्यक्ति केवल नौकरी नहीं खोजता, बल्कि अपने परिवार के बेहतर भविष्य की तलाश करता है। वह माँ-बाप की दवाइयों, बच्चों की पढ़ाई, बहन की शादी और परिवार की खुशियों के लिए हजारों किलोमीटर दूर जाकर मेहनत करता है।
वह निर्माण स्थलों पर काम करता है, फैक्ट्रियों में मशीनें चलाता है, खेतों में फसल उगाता है, अस्पतालों में सेवा देता है, स्कूलों में पढ़ाता है, आईटी कंपनियों में तकनीक विकसित करता है, प्रशासनिक सेवाओं में योगदान देता है और व्यापार में अपनी पहचान बनाता है।
उसकी मेहनत भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत करती है।
"प्रवासी" शब्द का दर्द
प्रवासी शब्द अपने आप में गलत नहीं है। किसी भी व्यक्ति का अपने मूल स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर बसना सामान्य बात है। लेकिन कई बार यह शब्द ऐसे प्रयोग किया जाता है कि व्यक्ति स्वयं को पराया महसूस करने लगता है।
कोविड-19 महामारी के दौरान पूरे देश ने देखा कि लाखों मजदूर पैदल अपने घर लौट रहे थे। उनमें बड़ी संख्या बिहार और पूर्वी भारत के लोगों की थी। उस समय यह स्पष्ट हो गया कि शहरों के निर्माण, उद्योगों और सेवाओं में बिहारियों की कितनी बड़ी भूमिका है।
बिहारियों की पहचान
बिहारी होने का अर्थ केवल बिहार में जन्म लेना नहीं है। इसका अर्थ है—
कठिन परिस्थितियों में भी हार न मानना।
शिक्षा को सम्मान देना।
मेहनत को अपना धर्म मानना।
परिवार और संस्कारों को महत्व देना।
कम संसाधनों में भी बड़े सपने देखने का साहस रखना।
यही कारण है कि आज देश-विदेश की अनेक कंपनियों, विश्वविद्यालयों, प्रशासनिक सेवाओं और उद्योगों में बिहारी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं।
शिक्षा और प्रतिभा
हर वर्ष बड़ी संख्या में बिहारी छात्र UPSC, IIT-JEE, NEET, बैंकिंग, रेलवे और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करते हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद वे कठिन परिश्रम से अपनी पहचान बनाते हैं।
देश के अनेक प्रसिद्ध शिक्षण संस्थानों और प्रशासनिक सेवाओं में बिहार के युवाओं की उल्लेखनीय उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि प्रतिभा किसी क्षेत्र की मोहताज नहीं होती।
बिहार से पलायन क्यों?
पलायन के पीछे अनेक कारण हैं—
पर्याप्त उद्योगों का अभाव।
निजी क्षेत्र में रोजगार के सीमित अवसर।
कृषि पर अत्यधिक निर्भरता।
बाढ़ और प्राकृतिक आपदाएँ।
बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की तलाश।
बड़े शहरों में अधिक आय की संभावना।
यदि इन चुनौतियों का समाधान किया जाए, तो बड़ी संख्या में लोग अपने राज्य में ही रोजगार प्राप्त कर सकते हैं।
बदलता बिहार
पिछले कुछ वर्षों में बिहार में सड़क, पुल, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई सकारात्मक बदलाव हुए हैं। नए मेडिकल कॉलेज, विश्वविद्यालय, एक्सप्रेस-वे, औद्योगिक क्षेत्रों और निवेश योजनाओं पर कार्य हो रहा है।
हालाँकि अभी लंबा सफर तय करना बाकी है। बिहार को ऐसे विकास मॉडल की आवश्यकता है जहाँ युवाओं को अपने ही राज्य में सम्मानजनक रोजगार मिले।
समाज की जिम्मेदारी
बिहार के विकास की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। समाज, उद्योग, शिक्षण संस्थान, प्रवासी बिहारी और युवा सभी की महत्वपूर्ण भूमिका है।
यदि बाहर रहने वाले बिहारी अपने अनुभव, निवेश और ज्ञान को बिहार के विकास में लगाएँ, तो राज्य तेजी से आगे बढ़ सकता है। छोटे उद्योग, स्टार्टअप, कृषि आधारित उद्योग, पर्यटन और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में अपार संभावनाएँ हैं।
सम्मान की संस्कृति
किसी भी भारतीय को उसके राज्य, भाषा या क्षेत्र के आधार पर कमतर नहीं आँकना चाहिए। भारत की विविधता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। जिस प्रकार एक पंजाबी, गुजराती, मराठी, तमिल, कश्मीरी या असमिया अपनी पहचान पर गर्व करता है, उसी प्रकार बिहारी को भी सम्मान मिलना चाहिए।
बिहारियों ने देश के हर राज्य के विकास में योगदान दिया है। इसलिए उनकी पहचान सम्मान, मेहनत और प्रतिभा से होनी चाहिए, न कि किसी पूर्वाग्रह से।
भविष्य की राह
आज आवश्यकता है कि बिहार को केवल श्रम देने वाला राज्य नहीं, बल्कि उद्योग, शिक्षा, तकनीक, कृषि और नवाचार का केंद्र बनाया जाए। जब बिहार में बड़े पैमाने पर निवेश होगा, रोजगार बढ़ेगा, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध होंगी, तब लाखों युवाओं को मजबूरी में पलायन नहीं करना पड़ेगा।
विकास तभी सार्थक होगा जब बिहार का युवा अपने सपनों को पूरा करने के लिए अपने ही राज्य में अवसर पाए।
निष्कर्ष
"एक बिहारी कब प्रवासी बन गया, उसे पता ही नहीं चला"—यह वाक्य केवल पीड़ा नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का विषय है। बिहारी घर इसलिए नहीं छोड़ता कि उसे अपनी मिट्टी से प्रेम नहीं है; वह इसलिए निकलता है क्योंकि वह अपने परिवार का भविष्य बेहतर बनाना चाहता है।
आज समय आ गया है कि हम बिहार को उसकी ऐतिहासिक गरिमा के अनुरूप आगे बढ़ाएँ। हमें ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जहाँ पलायन मजबूरी नहीं, बल्कि विकल्प हो। जहाँ कोई युवा केवल रोजगार की कमी के कारण अपना घर छोड़ने को विवश न हो।
बिहारी होना गर्व की बात है। यह संघर्ष, ज्ञान, श्रम, ईमानदारी और आत्मसम्मान की पहचान है। जिस दिन बिहार में अवसरों की कोई कमी नहीं रहेगी, उस दिन शायद कोई यह नहीं कहेगा—"मैं प्रवासी हूँ।" वह गर्व से कहेगा—"मैं बिहारी हूँ, और अपने बिहार में रहकर भारत के विकास में योगदान दे रहा हूँ।"
आइए, हम सब मिलकर ऐसा बिहार बनाने का संकल्प लें जहाँ हर हाथ को काम मिले, हर युवा को अवसर मिले, हर परिवार खुशहाल हो और बिहार फिर से ज्ञान, विकास और समृद्धि की नई पहचान बने।
बिहारी प्रवासी नहीं, भारत के विकास का मजबूत आधार है।
