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शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

बढ़ते तलाक के मामलों पर सामाजिक चिंता और ठोस कदमों की आवश्यकता







 वर्तमान समय में तलाक के बढ़ते मामले समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। टीवी न्यूज़ चैनलों, अखबारों और सोशल मीडिया के माध्यम से प्रतिदिन तलाक की खबरें सामने आ रही हैं। विवाह, जो भारतीय समाज में सामाजिक समरसता, प्रेम और पारिवारिक मूल्यों का प्रतीक माना जाता है, आज धीरे-धीरे कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है। पहले जहाँ परिवार “घर” कहलाता था, आज वह सीमित होकर केवल “कमरों” तक सिमटता जा रहा है।

छोटी-छोटी बातों पर रिश्तों का टूटना सामाजिक ढांचे के लिए खतरे की घंटी है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले समय में परिवार व्यवस्था और सामाजिक संरचना पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। युवाओं के बीच धैर्य, त्याग और आपसी समझ की कमी तलाक की बढ़ती प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रही है।

सरकार को चाहिए कि तलाक संबंधी कानूनी प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और संतुलित बनाया जाए, ताकि जल्दबाजी में लिए गए निर्णयों पर रोक लग सके और पहले सुलह-समझौते के प्रयास अनिवार्य हों। साथ ही, विवाह की न्यूनतम आयु निर्धारित करने के साथ-साथ अधिकतम आयु के अंतर पर भी विचार किया जाना चाहिए, ताकि अत्यधिक आयु-अंतर से उत्पन्न वैवाहिक असंतुलन को रोका जा सके।

सभी सामाजिक संगठनों को भी इस दिशा में जागरूकता अभियान चलाने चाहिए। परिवार परामर्श, वैवाहिक मार्गदर्शन और नैतिक शिक्षा को बढ़ावा देकर समाज में स्थिरता लाई जा सकती है।

समाजसेवी जितेंद्र कुशवाहा ने कहा कि विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और सामाजिक मूल्यों का मिलन है। इसे सशक्त बनाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

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