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शनिवार, 7 मार्च 2026

चमकते शहर में भूखी ज़िंदगियाँ” – जितेंद्र कुशवाहा


 जब हम आज़ादी के अमृत काल में प्रवेश कर चुके हैं और अपने देश को एक विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, तब हर तरफ विकास और प्रगति की चर्चा सुनाई देती है। बड़े-बड़े शहरों में ऊँची-ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें, मेट्रो की रफ्तार और आधुनिक सुविधाएँ यह बताती हैं कि भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। हम गर्व से कहते हैं कि हमारा देश विकासशील से विकसित भारत बनने की ओर बढ़ रहा है।

लेकिन जब मैं देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर निकलता हूँ, तो एक अलग ही तस्वीर सामने आती है। एक तरफ चमकती हुई इमारतें हैं, रोशनी से जगमगाते बाजार हैं और आरामदायक जीवन जीते लोग हैं। वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग ऐसे भी हैं जो फुटपाथ पर अपनी जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। उनके पास न रहने के लिए घर है, न ही जीवन की बुनियादी सुविधाएँ। कई लोग पूरे दिन मेहनत करने के बाद भी शाम की रोटी के लिए संघर्ष करते दिखाई देते हैं।

कभी-कभी सड़क किनारे छोटे-छोटे बच्चों को सोते हुए देखकर मन बहुत व्यथित हो जाता है। वे बच्चे जिनके हाथों में किताबें होनी चाहिए, वे जिंदगी की कठोर सच्चाइयों से जूझते नजर आते हैं। कोई कचरे के ढेर में कुछ ढूँढ़ रहा है, तो कोई भूख और मजबूरी के बीच अपनी जिंदगी काट रहा है। यह दृश्य मन में एक सवाल खड़ा करता है कि क्या यही हमारा विकास है? क्या हम सच में एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ हर व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर मिले?

विकास केवल ऊँची इमारतों और चमकती सड़कों से नहीं मापा जा सकता। असली विकास तब होगा जब समाज का सबसे कमजोर व्यक्ति भी सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जी सके। जब किसी को भूखे पेट सोना न पड़े, जब हर परिवार के पास रहने के लिए एक छोटी सी छत हो और जब हर बच्चे को शिक्षा और बेहतर भविष्य का अवसर मिले।

आज जरूरत है कि हम केवल विकास के आंकड़ों पर गर्व करने के बजाय समाज के उन लोगों की ओर भी ध्यान दें जो आज भी गरीबी और अभाव में जीवन जी रहे हैं। सरकार के साथ-साथ समाज के सक्षम लोगों और सामाजिक संगठनों को भी आगे आकर ऐसे जरूरतमंद लोगों की मदद करनी चाहिए। छोटे-छोटे प्रयास भी किसी की जिंदगी में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

हमारे समाज की असली ताकत हमारी संवेदनशीलता और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी की भावना में छिपी है। अगर हम अपने आसपास के जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए हाथ बढ़ाएँ, तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है।

अंत में यही कहना उचित होगा कि विकास तभी सार्थक है जब उसकी रोशनी समाज के हर वर्ग तक पहुँचे। जब अमीरी और गरीबी के बीच की दूरी कम हो और हर व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार मिले।

क्योंकि सच यही है कि चमकते शहरों की रोशनी के पीछे आज भी कुछ भूखी ज़िंदगियाँ ऐसी हैं, जो हर दिन सिर्फ दो वक्त की रोटी और एक सुरक्षित छत की तलाश में जी रही हैं।

— जितेंद्र कुशवाहा


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