— दिनेश कुमार कुशवाहा, सामाजिक कार्यकर्ता की कलम से
जय विहार, नई दिल्ली दिनांक 31/05/2026 जीवन के लंबे अनुभवों ने मुझे एक बात गहराई से समझाई है कि केवल अच्छा इंसान होना ही पर्याप्त नहीं है। यह बात सुनने में कठोर लग सकती है, लेकिन आज के भौतिकवादी दौर की यही वास्तविकता है। यदि कोई व्यक्ति ईमानदार, निष्ठावान, मददगार और स्वाभिमानी है, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर है, तो उसे अक्सर वह सम्मान, सहयोग और महत्व नहीं मिल पाता जिसका वह वास्तव में हकदार होता है।
हम सब चाहते हैं कि रिश्ते प्रेम, विश्वास और संवेदनाओं के आधार पर बने रहें। हम यह भी मानते हैं कि सच्ची मित्रता धन-दौलत से ऊपर होती है। लेकिन व्यवहारिक जीवन में कई बार देखने को मिलता है कि आर्थिक कमजोरी आने पर लोगों का व्यवहार बदलने लगता है। जो लोग कभी हर समय साथ दिखाई देते थे, वे धीरे-धीरे दूरी बना लेते हैं। फोन कम आने लगते हैं, सलाह लेने वाले लोग भी कम हो जाते हैं और समाज में आपकी बात का वजन भी पहले जैसा नहीं रह जाता।
दूसरी ओर, हम देखते हैं कि कई ऐसे लोग, जिनका चरित्र आदर्श नहीं माना जा सकता, जिनके व्यवहार में कठोरता, स्वार्थ या अनैतिकता होती है, लेकिन उनके पास धन और शक्ति होती है। समाज के अनेक लोग उनके आसपास बने रहते हैं, उनका सम्मान करते हैं, उनकी बातों को महत्व देते हैं। यह स्थिति आदर्श नहीं है, लेकिन वर्तमान सामाजिक व्यवस्था का एक कटु सत्य अवश्य है।
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि हमें सत्य, ईमानदारी और नैतिकता छोड़ देनी चाहिए। बल्कि इसका अर्थ यह है कि अच्छे गुणों के साथ-साथ आर्थिक रूप से भी मजबूत बनना आवश्यक है। केवल आदर्शों के सहारे जीवन नहीं चलता, और केवल धन के सहारे भी स्थायी सम्मान नहीं मिलता। जीवन में संतुलन जरूरी है।
आज के समय में हमें अपने बच्चों को केवल अच्छी शिक्षा और संस्कार ही नहीं देने चाहिए, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता का महत्व भी समझाना चाहिए। उन्हें यह सिखाना चाहिए कि सम्मानजनक जीवन जीने के लिए चरित्र और आर्थिक शक्ति दोनों आवश्यक हैं। पैसा जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं होना चाहिए, लेकिन इतना अवश्य होना चाहिए कि स्वाभिमान से जीवन जी सकें, अपने परिवार की जरूरतें पूरी कर सकें और जरूरतमंदों की सहायता भी कर सकें।
मैंने अपने सामाजिक जीवन में यह अनुभव किया है कि जब व्यक्ति आर्थिक रूप से मजबूत होता है, तब उसके अच्छे कार्यों का प्रभाव भी अधिक व्यापक होता है। वह समाज सेवा भी बेहतर ढंग से कर सकता है और अपने विचारों को भी अधिक प्रभावशाली ढंग से रख सकता है। आर्थिक कमजोरी कई बार अच्छे इरादों और बड़े सपनों को भी सीमित कर देती है।
इसलिए मेरा मानना है कि जीवन में सत्य, निष्ठा, ईमानदारी और मानवता को कभी न छोड़ें, लेकिन साथ ही धन अर्जित करने की कला भी सीखें। मेहनत से कमाएँ, समझदारी से खर्च करें और भविष्य के लिए बचत भी करें। क्योंकि स्वाभिमान की रक्षा के लिए चरित्र जितना आवश्यक है, उतनी ही आर्थिक स्थिरता भी आवश्यक है।
याद रखिए, केवल धन से सम्मान नहीं मिलता और केवल अच्छे चरित्र से जीवन नहीं चलता। स्थायी सफलता तब मिलती है जब चरित्र की ऊँचाई और आर्थिक मजबूती दोनों साथ-साथ चलें।

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