समाज में बढ़ती विभाजनकारी सोच और आपसी भेदभाव के इस दौर में सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना अत्यंत आवश्यक हो गया है। समाजसेवी जितेन्द्र कुशवाहा ने कहा कि समरसता ही वह मूल आधार है, जिस पर एक सशक्त, संगठित और विकसित समाज का निर्माण संभव है।उन्होंने कहा कि आज समाज अनेक वर्गों, जातियों, धर्मों और विचारधाराओं में बंटता जा रहा है, जिससे आपसी दूरी और असमानता बढ़ रही है। ऐसे समय में हमें सभी के प्रति समान भाव, आपसी सम्मान और एकता की भावना को अपनाने की जरूरत है। जब हम एक-दूसरे के धर्म, संस्कृति और विचारों का सम्मान करते हैं, तभी सच्चे अर्थों में भाईचारा स्थापित होता है।
जितेन्द्र कुशवाहा ने आगे कहा कि सामाजिक समरसता से न केवल विवाद कम होते हैं, बल्कि समाज में प्रेम, सहयोग और विश्वास भी मजबूत होता है। एक समरस समाज में हर व्यक्ति को समान अवसर मिलता है, जिससे वह अपनी क्षमताओं का पूर्ण विकास कर सकता है।
उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि हमें अपने भीतर से ऊँच-नीच और भेदभाव की भावना को समाप्त करना होगा और "वसुधैव कुटुंबकम्" की भावना को अपनाना होगा। समाज तभी प्रगति करेगा, जब हर वर्ग और हर व्यक्ति साथ मिलकर आगे बढ़ेगा।
अंत में उन्होंने सभी से आह्वान किया कि वे सामाजिक समरसता को केवल एक विचार न मानें, बल्कि इसे अपने जीवन और व्यवहार में उतारें।
🙏 एकता में ही शक्ति है, और समरसता में ही समाज की सच्ची उन्नति।
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