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बुधवार, 17 जून 2026

संघर्ष में खोया मुसाफ़िर | जीवन संघर्ष और उम्मीद पर भावुक हिंदी कविता | जितेन्द्र कुशवाहा

 

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लेखक: जितेन्द्र कुशवाहा विषय: कविता / जीवन दर्शन / संघर्ष और उम्मीद

रात को सोया, कुछ मिला नहीं,
दिन में जगा, फिर भी कुछ पाया नहीं।
ज़िंदगी के इस कठिन सफ़र में,
खुद को कहीं भी पाया नहीं।

संघर्ष की राहों में तन्हा हूँ,
आज भी अकेला, कल भी रहूँगा।
अपनों को सँवारते-सँवारते,
खुद को ही मैं खोता रहूँगा।

रंग थे कभी मेरे जीवन में,
अब हर रंग जैसे फीका है।
खुशियों की चाह में भटकते-भटकते,
हर सपना अधूरा सा लिखा है।

रास्ते की तलाश में निकला था,
मगर राह ही कहीं खो गई।
मंज़िल की झलक भी धुंधली है,
हर उम्मीद जैसे सो गई।

चलता हूँ फिर भी थककर नहीं,
दिल में एक उम्मीद लिए।
ज़िंदगी, तेरी याद में बस,
चला जा रहा हूँचला जा रहा हूँ।

मेरी कलम से, जितेन्द्र कुशवाहा


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संघर्ष में खोया मुसाफ़िर | जीवन संघर्ष और उम्मीद पर भावुक हिंदी कविता | जितेन्द्र कुशवाहा

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