नई दिल्ली, समाजसेवा केवल एक कार्य नहीं, बल्कि त्याग, संघर्ष और संवेदनशीलता से भरी एक सतत यात्रा है। एक समाजसेवी का दर्द समाज के प्रति उसकी गहरी जिम्मेदारी से जुड़ा होता है। वह अपनी व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं को पीछे छोड़कर समाज के वंचित, शोषित और जरूरतमंद वर्ग के लिए कार्य करता है। समाजसेवी का जीवन अक्सर चुनौतियों, उपेक्षा और आलोचनाओं से भरा होता है, लेकिन फिर भी उसका संकल्प कमजोर नहीं पड़ता।
समाज में फैली अशिक्षा, गरीबी, नशा, बेरोजगारी और सामाजिक कुरीतियाँ समाजसेवी के मन को निरंतर व्यथित करती हैं। कई बार निस्वार्थ सेवा को गलत नजर से देखा जाता है और उसके प्रयासों को संदेह की दृष्टि से परखा जाता है। बावजूद इसके, समाजसेवी अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होता, क्योंकि उसके लिए समाज का उत्थान ही सर्वोपरि होता है।
समाजसेवी का सबसे बड़ा दर्द तब होता है जब जागरूकता के अभाव में लोग अपने अधिकारों और कर्तव्यों को नहीं समझ पाते। वह शिक्षा, समानता और सामाजिक समरसता के माध्यम से परिवर्तन लाने का प्रयास करता है। किसी भूखे को भोजन, किसी बच्चे को शिक्षा और किसी पीड़ित को न्याय दिलाने का प्रयास ही उसके संघर्ष की सार्थकता है।
जितेन्द्र कुशवाहा का मानना है कि समाज का वास्तविक विकास तभी संभव है जब सेवा भाव को आंदोलन बनाया जाए और हर नागरिक सामाजिक जिम्मेदारी निभाए। समाजसेवी का दर्द दरअसल एक बेहतर, न्यायपूर्ण और संवेदनशील समाज बनाने की प्रेरणा है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए मजबूत आधार तैयार करती है।



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